अकाली दल से गठबंधन पर BJP में पेंच, सीट शेयरिंग बनी चुनौती
नई दिल्ली, 26 अक्टूबर 2026 | पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी (BJP) और शिरोमणि अकाली दल (SAD) के बीच दोबारा गठबंधन की चर्चाएं तेज हो गई हैं। दोनों दल अतीत में लंबे समय तक साथ चुनाव लड़ चुके हैं, लेकिन इस बार राजनीतिक परिस्थितियां बदल चुकी हैं। बीजेपी राज्य में अपना स्वतंत्र जनाधार बढ़ाने की कोशिश कर रही है, जबकि अकाली दल भी अपनी पारंपरिक राजनीतिक जमीन मजबूत करना चाहता है। ऐसे में हिंदू और सिख मतदाताओं के बीच समर्थन का समीकरण, सीटों का बंटवारा और नेतृत्व का सवाल गठबंधन की राह में अहम चुनौतियां बनकर सामने आए हैं।
सुखबीर बादल के बयान ने खोले गठबंधन के दरवाजे
अकाली दल के चीफ सुखबीर सिंह बादल ने स्पष्ट किया है कि उनकी पार्टी समान विचारधारा वाले दलों के साथ गठबंधन करने के लिए तैयार है। हालांकि, उन्होंने कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के साथ किसी भी तरह के समझौते की संभावना को खारिज किया है। बादल ने दोनों दलों को पंजाब का सबसे बड़ा दुश्मन बताया। उनके इस बयान को बीजेपी के साथ संभावित राजनीतिक समझौते के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ सुखबीर बादल की मुलाकात और कुछ अहम मुद्दों पर अकाली दल के रुख ने भी दोनों दलों के बीच नजदीकी की अटकलों को हवा दी थी। हालांकि, अब तक किसी भी पार्टी ने आधिकारिक रूप से गठबंधन की पुष्टि नहीं की है।
बीजेपी के आंतरिक आकलन में क्या है चिंता?
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, बीजेपी पंजाब में संभावित गठबंधन के फायदे और नुकसान का आकलन कर रही है। पार्टी के सामने सवाल है कि अकाली दल के साथ आने पर क्या दोनों दलों के समर्थक एक-दूसरे के उम्मीदवारों को वोट देंगे या नहीं।
पहले गठबंधन में बीजेपी को शहरी क्षेत्रों में हिंदू मतदाताओं के बीच समर्थन मिलता था, जबकि अकाली दल का प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों और सिख मतदाताओं के एक हिस्से में मजबूत था। दोनों दलों के वोट बैंक एक-दूसरे के पूरक माने जाते थे। लेकिन अब बीजेपी भी ग्रामीण पंजाब और सिख बहुल सीटों पर अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रही है। इससे पुराने गठबंधन का चुनावी गणित पहले जैसा रहना निश्चित नहीं है।
हालांकि, बीजेपी के किसी कथित इंटरनल सर्वे के विस्तृत आंकड़े सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि गठबंधन केवल सर्वे के कारण रुका हुआ है। सीट बंटवारा, नेतृत्व और दोनों दलों के बदले राजनीतिक आधार भी महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।
हिंदू और सिख वोटों का समीकरण क्यों अहम?
पंजाब की राजनीति में बीजेपी और अकाली दल की पुरानी साझेदारी का एक आधार दोनों दलों के अलग-अलग सामाजिक और क्षेत्रीय समर्थन को जोड़ना था। बीजेपी शहरी इलाकों में अपनी पकड़ के सहारे चुनाव लड़ती थी, जबकि अकाली दल का संगठन ग्रामीण क्षेत्रों में मजबूत माना जाता था।
अब हालात में बदलाव आया है। बीजेपी राज्य में अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है और उसने सिख समुदाय के बीच भी अपना आधार बढ़ाने की कोशिश की है। दूसरी ओर, अकाली दल अपने पारंपरिक समर्थकों को बनाए रखने के साथ नए क्षेत्रों में प्रभाव बढ़ाना चाहता है।
यही वजह है कि संभावित गठबंधन में केवल सीटों की संख्या तय करना पर्याप्त नहीं होगा। दोनों दलों को यह भी देखना होगा कि किस सीट पर किस उम्मीदवार की स्थानीय पकड़ है और गठबंधन के दूसरे साथी के समर्थक उसे कितना समर्थन देते हैं।
2024 के लोकसभा चुनाव के आंकड़े क्या बताते हैं?
2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी और अकाली दल ने पंजाब में अलग-अलग चुनाव लड़ा था। चुनाव आयोग के परिणामों के अनुसार, बीजेपी को राज्य में करीब 18.6 प्रतिशत वोट मिले, लेकिन पार्टी कोई सीट नहीं जीत सकी। वहीं, अकाली दल का वोट शेयर लगभग 13.4 प्रतिशत रहा और उसे एक लोकसभा सीट मिली।
इन आंकड़ों से पता चलता है कि दोनों दलों का अपना-अपना मतदाता आधार मौजूद है, लेकिन वोट प्रतिशत को सीटों में बदलना अलग चुनौती है। दोनों के वोट शेयर को जोड़कर गठबंधन की संभावित जीत तय नहीं की जा सकती, क्योंकि मतदाताओं का समर्थन उम्मीदवार, स्थानीय मुद्दों और राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार बदल सकता है।
सीट बंटवारे पर भी फंस सकता है मामला
बीजेपी और अकाली दल के बीच गठबंधन की चर्चा में सबसे बड़ा व्यावहारिक सवाल सीटों का बंटवारा है। 2017 के विधानसभा चुनाव में अकाली दल ने 94 सीटों पर और बीजेपी ने 23 सीटों पर चुनाव लड़ा था। उस समय अकाली दल गठबंधन में बड़े साझेदार की भूमिका में था।
अब बीजेपी राज्य की सभी 117 विधानसभा सीटों पर अपनी संगठनात्मक मौजूदगी बढ़ाने और ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने की बात कह रही है। दूसरी तरफ, अकाली दल भी अपनी पारंपरिक सीटों पर मजबूत दावेदारी रखना चाहता है। ऐसे में पुराने सीट बंटवारे के फॉर्मूले को दोहराना आसान नहीं होगा।
इसके अलावा मुख्यमंत्री पद के चेहरे को लेकर भी सवाल है। अकाली दल के लिए सुखबीर सिंह बादल की भूमिका महत्वपूर्ण है, जबकि बीजेपी अपनी राजनीतिक स्थिति के अनुरूप गठबंधन में अधिक प्रभाव चाह सकती है। इन मुद्दों पर सहमति बने बिना गठबंधन की औपचारिक घोषणा मुश्किल हो सकती है।
बीजेपी और अकाली दल लंबे समय तक राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के सहयोगी रहे। सितंबर 2020 में कृषि कानूनों को लेकर मतभेद बढ़ने के बाद अकाली दल ने NDA से अलग होने का फैसला किया। इसके बाद दोनों दलों ने 2022 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में अलग-अलग चुनाव लड़ा।
अब 2027 के चुनाव से पहले दोनों दलों के नेताओं के बयानों ने फिर से गठबंधन की संभावनाओं पर चर्चा शुरू कर दी है। हालांकि, राजनीतिक संकेतों और औपचारिक गठबंधन की घोषणा में अंतर है। अभी तक दोनों दलों के बीच किसी अंतिम चुनावी समझौते की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।
पंजाब में बीजेपी और अकाली दल के संभावित गठबंधन का भविष्य कई सवालों पर निर्भर करेगा—कितनी सीटों पर कौन चुनाव लड़ेगा, दोनों दलों के समर्थकों के वोट कितने प्रभावी ढंग से एक-दूसरे को मिलेंगे और नेतृत्व की भूमिका क्या होगी।
बीजेपी के लिए राज्य में अपना स्वतंत्र आधार बढ़ाना महत्वपूर्ण है, जबकि अकाली दल के लिए अपनी क्षेत्रीय पहचान और पारंपरिक समर्थन को मजबूत करना अहम है। इसलिए गठबंधन की चर्चा केवल पुराने राजनीतिक रिश्ते बहाल करने तक सीमित नहीं है; इसमें बदले हुए चुनावी समीकरणों के अनुरूप नई शर्तें तय करना भी शामिल है।
फिलहाल, पंजाब में बीजेपी-अकाली दल गठबंधन को लेकर अटकलें जारी हैं। अंतिम फैसला दोनों दलों के नेतृत्व की बातचीत और चुनावी रणनीति पर निर्भर करेगा।


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