राष्ट्र भक्ति के नाम पर लाखों का घोटाला 

         

       " आलोक गौड़  "

" कबीरा खड़ा बाजार में, मांगे सबकी खैर 
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर "

नई दिल्ली l  दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी की रेखा गुप्ता सरकार अभी तक सभी मामलों में पूरी तरह से विफल साबित हुई है l लेकिन बयानबाज़ी और भ्रष्टाचार के मामले में उसने अल्प समय में ही अपने झंडे गाड़ दिए हैं l सबसे बड़ी शर्मनाक बात तो यह है कि देश व राष्ट्र भक्ति के नाम पर भी लाखों रुपए का घोटाला मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के अधीनस्थ सामान्य प्रशासन विभाग ने किया है l
यह घोटाला राष्ट्रीय ध्वज खरीदने के नाम पर हुआ है l
दिल्ली सरकार के सूत्रों के मुताबिक स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर तिरंगे झंडे खरीदने के लिए सामान्य प्रशासनिक विभाग ने स्वतंत्रता दिवस से दो दिन पहले हर घर तिरंगा योजना के तहत सात लाख झंडे खरीदने के लिए टेंडर आमंत्रित किए थे, इस टेंडर की शर्तों के मुताबिक झंडों का साईज 900 मिलीमीटर गुणा 1350 मिलीमीटर होना चाहिए था, इसके साथ ही झंडो के डंडों का साइज 6 फीट होना था l इस तरह के झंडों की आपूर्ति करने के लिए तीन फर्मों ने टेंडर जमा कराए थे, जिनके नाम अनिरत कॉन्ट्रैक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड, स्पेश फॉर बिज़नेस सॉल्यूशन प्राइवेट लिमिटेड और विनायक प्रोडक्ट कंपनी थे l
दिल्ली सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग के अधीक्षक भास्कर प्रियदर्शी ने मनमाने तरीके से दो कंपनियों के टेंडर खारिज करते हुए अनिरत कॉन्ट्रैक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड को झंडे सप्लाई करने का काम सौंप दिया l टेंडर की शर्तों के मुताबिक झंडे के साथ ही छह फुट का डंडा भी दिया जाना था l झंडे और डंडा दोनों के लिए 60 रुपए दिए जाने थे l
दिल्ली सरकार के अधिकारियों के मुताबिक जिस कंपनी को झंडे की सप्लाई करने का ठेका दिया गया था उसने न केवल झंडे के साईज में गडबडी की बल्कि उनका कपड़ा भी घटिया किस्म का होने के साथ ही डंडे भी 4 फीट के दिये, इतना ही नहीं उसने अन्य शर्तों का भी उल्लंघन किया l
अधिकारियों के मुताबिक  जिस कंपनी को ठेका दिया गया था उसने केवल दस फीसदी झंडे ही टेंडर की शर्तों का पालन करते हुए दिए l यह अतिविशिष्ट व विशिष्ट व्यक्तियों को भेज दिए थे l जबकि शेष 90 फीसदी झंडों के मामले में जमकर हेराफेरी की गई l सूत्रों के मुताबिक झंडे सप्लाई करने के चार करोड़ रुपए के इस ठेके में कम से कम एक करोड़ रुपये भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गए हैं l उनका यह भी कहना है कि इस करोड़ रुपए की बंदरबांट में ऊपर से लेकर नीचे तक सभी शामिल हैं l उनका यह भी कहना है कि बिना ऊपरी आदेश के एक अधिकारी की इतनी हिम्मत नहीं हो सकती है कि वह अपनी मर्जी से किसी भी कंपनी को न केवल ठेका दे दे बल्कि उसकी ओर से ठेके की शर्तों को भी अनदेखा कर दे l