चुनाव आयोग की दादागिरी
" आलोक गौड़ "
" कबीरा खड़ा बाजार में, मांगे सबकी खैर,
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर। "
नई दिल्ली। भारत के चुनाव आयोग ने जहां एक ओर सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बावजूद बिहार में मतदाता सूची के पुनरीक्षण में आधार कार्ड को मान्यता देने से इनकार करने की धृष्टता दिखाई है। वहीं चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने इस मामले में मृतकों को मतदान का अधिकार देने का सवाल उठा कर विपक्ष पर जवाबी हमला करने का प्रयास किया है। इन दोनों ही बातों से ऐसा लगता है अपने आकाओं के बल पर चुनाव आयोग अब पूरी तरह से दादागिरी पर उतर आया है।
बिहार में विधानसभा चुनाव से ऐन पहले मतदाता सूची का गहन पुनरीक्षण कराए जाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन मामले की सुनवाई के दौरान अपने हलफनामे में चुनाव आयोग ने कहा है कि मतदाता बनाने के लिए आधार कार्ड को मान्यता देना सही कदम नहीं है। जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले की पिछली सुनवाई के दौरान बिहार में मतदाता बनाने के लिए आधार कार्ड, राशन कार्ड व मतदाता पहचान पत्र को भी मान्यता देने के लिए कहा था। अदालत ने भारतीय नागरिकों की पहचान करने के चुनाव आयोग के अधिकार पर भी सवाल उठाए थे।
चुनाव आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय में दिए गए अपने हलफनामे में जिन तथ्यों का हवाला दिया है, वह तर्क की कसौटी पर किसी भी तरह से खरे नहीं उतरते हैं।
संविधान व कानूनी मामलों के विशेषज्ञों के मुताबिक चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बावजूद आधार कार्ड, राशन कार्ड व मतदाता पहचान पत्र को मतदाता सूची में पंजीकृत करने के लिए मान्यता देने से इनकार करके अपने लिए परेशानी मोल ले ली है। क्यूंकि अगली सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय इसे अपनी अवमानना के तौर पर देख सकता है। हालांकि उनका यह भी मानना है कि अदालत ने पिछली बार इस बारे में केवल सलाह दी थी और किसी प्रकार का कोई आदेश पारित नहीं किया था। इस लिहाज से चुनाव आयोग अवमानना करने और उस कारण होने वाली कार्रवाई से बच सकता है। लेकिन निश्चित रूप से इस बार अदालत बिहार में मतदाता के गहन पुनरीक्षण के संबंध में चुनाव आयोग की ओर से चलाए जा रहे अभियान के बारे में आदेश जारी करेगी।
इसी बीच मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने विपक्ष की ओर से उठाए जा रहे सवालों का जवाब देने के साथ ही उन्हें ही घेरने का प्रयास किया है। हालांकि ऐसा करके वह खुद ही अपने जाल में फंस गए हैं।
मुख्य चुनाव आयुक्त ने पूछा है कि भला मृतकों को मतदाता कैसे बनने दिया जा सकता है। उनकी यह बात पूरी तरह से जायज है। लेकिन सवाल यह उठता है कि चुनाव आयोग हर साल में कई कई बार मतदाता सूची की समीक्षा व संशोधन करने का अभियान चलाता है, फिर भला बिहार में 20 लाख मृतकों के नाम मतदाता सूची में कैसे रह गए। इसके दो ही कारण हो सकते हैं। पहला यह की हर साल पहली जनवरी, पहली अप्रैल, पहली जुलाई व पहली अक्टूबर को चलाए जाने वाले अभियान के दौरान काम ईमानदारी के साथ नहीं किया जाता और महज खानापूर्ति की जाती है। दूसरा यह की बिहार के बारे में मुख्य चुनाव आयुक्त गलतबयानी कर रहे हैं।
इसी बीच केंद्र में भारतीय जनता पार्टी नीत सरकार के सहयोगी जनता दल यूनाइटेड के सांसद गिरधारी यादव ने बिहार में मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण अभियान को लेकर चुनाव आयोग पर तीखा हमला बोला है, उनका कहना है कि चुनाव आयोग को बिहार के बारे में न तो भौगोलिक ज्ञान है और न ही व्यवहारिक। उसे बिहार के इतिहास के बारे में भी कुछ नहीं पता है। बरसात के दिनों में राज्य के लोग खेतीबाड़ी के काम में व्यस्त रहते हैं। जबकि कुछ हिस्से के लोगों को बाढ़ के प्रकोप का सामना करना पड़ता है। ऐसे समय में चुनाव अयोग ने लोगों को अपनी नागरिकता साबित करने के लिए जरूरी दस्तावेज ढूंढने के काम में लगा दिया है। उन्होंने चुनाव से पहले यह अभियान चलाने की मंशा पर भी सवाल उठाए हैं। विपक्ष व सर्वोच्च न्यायालय ने यह ही सवाल पूछा है।
ऐसा लगता है कि चुनाव आयोग को किसी की परवाह नहीं, उसका मकसद तो सिर्फ अपने आका का हुक्म मानना ही है।
बहरहाल अब देखना यह है कि 28 जुलाई को इस मामले की सुनवाई के दौरान देश की अदालत क्या कदम उठाती है।


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