आखिर कब थमेगा ऐसी मौतों का सिलसिला!

" आलोक गौड़ "

" कबीरा खड़ा बाजार में, मांगे सबकी खैर
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर। "


नई दिल्ली।  सर्वोच्च न्यायालय ने इसी साल 29 जनवरी को दिल्ली सहित सभी प्रमुख शहरों में सीवर व सेप्टिक टैंक आदि की हाथ से सफाई करने पर पूरी तरह से रोक लगा दी थी। बावजूद इसके दिल्ली सरकार के लोक निर्माण विभाग, दिल्ली जल बोर्ड दिल्ली नगर निगम व अन्य निकायों की ओर से सीवर, सेप्टिक टैंक और नालों की सफाई का काम मशीनों के बजाय हाथ से कराया जा रहा है। जिसका खामियाजा गरीब सफाई कर्मचारियों को अपनी जान देकर भुगतना पड़ रहा है।
शनिवार 26 जुलाई को बाहरी दिल्ली के छावला में एक निर्माणाधीन इमारत के सीवर को साफ करने के लिए उसमें उतरे दो सफाई कर्मचारी जीवित वापिस नहीं लौटे। सीवर से निकलने वाली जहरीली व दमघोटू गैस की चपेट में आ कर उनकी दर्दनाक मौत हो गई। पता चला है कि दोनों। को किसी भी प्रकार के सुरक्षा उपकरण दिए बिना ही। सीवर में उतार दिया गया था।
बिना किसी सुरक्षा उपकरण व बचाव के साधन के बिना सीवर सेप्टिक टैंक और नालों की सफाई के दौरान सफाई कर्मचारियों के मरने की यह इस साल की पहली घटना नहीं है बल्कि सर्वोच्च न्यायालय के हाथ से सीवर की सफाई पर प्रतिबंध लगाने के चंद दिनों के बाद ही इस कारण होने वाली मौतों का सिलसिला शुरू हो गया था। जो आज तक थमने का नाम नहीं ले रहा है।
21 फरवरी 2025 को नरेला इलाके में सीवर की सफाई करने वाले दो कर्मचारी मौत का शिकार हो गए थे। उसके बाद 17 मार्च को न्यू फ्रेंड्स कालोनी में दिल्ली जल बोर्ड के सीवर की सफाई करने के लिए काफी अर्से से बंद पड़े मेनहोल में उतरे एक 46 साल के व्यक्ति की मौत हो गई थी। जिसे दिल्ली जल बोर्ड ने अपना कर्मचारी मानने और किसी भी प्रकार का मुआवजा देने से साफ इनकार कर दिया। क्योंकि छत्तीसगढ़ के 46 वर्षीय पंथ लाल चंद्रा को ठेकेदार ने काम पर लगाया था।
इसी साल 7 मई को द्वारका के सुर्खलपुर में सीवर की सफाई के दौरान 22 साल के एक नवयुवक की मृत्यु हो गई थी। इसके बाद 9 जुलाई को पश्चिम विहार के बाला जी एक्शन अस्पताल में सीवर की सफाई के लिए 26 वर्षीय बृजेश व 30 साल के विक्रम भी असमय काल के गाल में समा गए।
दिल्ली नगर निगम हर साल साफ सफाई व स्वच्छता के लिए करोड़ों रुपए की राशि का प्रावधान करता है। बावजूद इसके सीवर, सेप्टिक टैंक व नालों की सफाई का काम आज भी हाथों से हो कराया जा रहा है। यह न केवल अमानवीय है बल्कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की अवहेलना भी है।
दिल्ली सरकार की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने भी अपने बजट भाषण में राजधानी की सफाई व्यवस्था में सुधार लाने के लिए बड़ी बड़ी घोषणाएं की थीं। लेकिन हकीकत तो यह है की उनकी सरकार के अधिनस्थ दिल्ली जल बोर्ड, लोक निर्माण विभाग व अन्य विभागों में सीवर की सफाई का काम हाथ से ही कराया जा रहा है।
नालों की सफाई कराने का ढिंढोरा पीटने के लिए लोक निर्माण मंत्री परवेश साहिब सिंह ने हाल ही में जो फोटो सोशल मीडिया पर डाली थीं, उनमें साफ नजर आ रहा था कि सफाई करने के लिए कर्मचारी नंगे बदन नाले में उतरे हुए हैं। हालांकि जब उन्हें यह बताया गया कि यह फोटो सर्वोच्च न्यायालय का आदेश का उल्लंघन कर रहीं हैं तो उन्होंने इन्हें हटा दिया।
सफाई कर्मचारियों के हक़ की लड़ाई लड़ने वाले दलित आदिवासी शक्ति अधिकार मंच व सफाई कर्मचारी आंदोलन के नेताओं के मुताबिक हर साल दूरदराज के इलाकों के हजारों लोग आजीविका कमाने और सुनहरी भविष्य के सपने लेकर दिल्ली आते हैं। लेकिन यहां रोजगार न मिलने और पेट भरने की मजबूरी में सीवर, सेप्टिक टैंक व नालों की सफाई का सरकारी ठेका लेने वाले ठेकेदार के चंगुल में फंस जाते हैं। यह ठेकेदार उन्हें सुरक्षा उपकरण मुहैया कराए बिना ही सीवर में उतार देते हैं। जिसका नतीजा सफाई कर्मचारियों की मौत के रूप में सामने आता है। 
एक ओर तो मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता अपनी सरकार से सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का पालन कराने और सीवर व नालों की सफाई के लिए आधुनिक मशीनें में विफल रही है। दूसरी ओर उन्होंने दिल्ली नगर निगम के कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप करते हुए दिल्ली में पहली अगस्त से एक माह तक विशेष सफाई अभियान चलाने की घोषणा कर दी है। दिलचस्प बात तो यह है कि दिल्ली के महापौर राजा इकबाल सिंह पहले ही सफाई अभियान चलाने की बात कर चुके हैं। वैसे भी साफ सफाई व स्वच्छता नगर निगम का प्रमुख कार्य है। वैसे भी साफ सफाई एक निरन्तर चलने वाली सतत् प्रक्रिया है। उसके लिए भला एक माह का विशेष अभियान चलाने की क्या आवश्यकता है। सवाल तो यह भी उठता है कि इस विशेष अभियान के दौरान प्रतिदिन जो अतिरिक्त कूड़ा निकलेगा उसका निस्तारण कैसे किया जाएगा। क्योंकि अभी जितना कूड़ा इक्कठा होता है उसमें से आधा ही ठिकाने लगाया जाता है। बाकि तीन बड़ी लैंडफिल में कूड़े के पहाड़ के आकर में इजाफा करने के लिए उनमें डाल दिया जाता है।