कर्नाटक सरकार का बयान: राष्ट्रपति और राज्यपाल केवल नाममात्र के प्रमुख

कर्नाटक सरकार का बयान: राष्ट्रपति और राज्यपाल केवल नाममात्र के प्रमुख

नई दिल्ली, । 09 सितम्बर 2025 । सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को राष्ट्रपति के संदर्भ पर आठवें दिन सुनवाई हुई, जिसमें यह पूछा गया था कि क्या अदालतें राज्य विधानसभाओं में पास बिलों पर विचार करने के लिए राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिए समय-सीमा निर्धारित कर सकता है।

कांग्रेस के नेतृत्व वाली कर्नाटक सरकार ने इस पर अपनी दलील दी और कहा कि संवैधानिक व्यवस्था के तहत, राष्ट्रपति और राज्यपाल सिर्फ नाममात्र के प्रमुख हैं। दोनों, केंद्र और राज्यों में मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर काम करने के लिए बाध्य हैं।

कर्नाटक सरकार की ओर से सीनियर एडवोकेट गोपाल सुब्रमण्यम ने चीफ जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली 5-जजों की बेंच को बताया कि विधानसभा में पारित बिलों पर कार्रवाई के लिए राज्यपाल की संतुष्टि ही मंत्रिपरिषद की संतुष्टि है।

सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली 5-जजों की संविधान पीठ राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के 14 सवालों की जांच कर रहा है। बेंच में जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदुरकर भी शामिल हैं।

तमिलनाडु से शुरू हुआ था विवाद...

यह मामला तमिलनाडु गवर्नर और राज्य सरकार के बीच हुए विवाद से उठा था। जहां गवर्नर से राज्य सरकार के बिल रोककर रखे थे। सुप्रीम कोर्ट ने 8 अप्रैल को आदेश दिया कि राज्यपाल के पास कोई वीटो पावर नहीं है।

इसी फैसले में कहा था कि राज्यपाल की ओर से भेजे गए बिल पर राष्ट्रपति को 3 महीने के भीतर फैसला लेना होगा। यह ऑर्डर 11 अप्रैल को सामने आया था। इसके बाद राष्ट्रपति ने मामले में सुप्रीम कोर्ट से राय मांगी और 14 सवाल पूछे थे।

केंद्र ने कहा था- राज्य सरकारें मामले में SC नहीं जा सकतीं सुप्रीम कोर्ट पहले भी कह चुका है कि अगर राज्यपाल अनिश्चित समय तक बिल रोक कर रखते हैं, तो 'जल्दी' शब्द का महत्व खत्म हो जाएगा। हालांकि, केंद्र सरकार ने तर्क दिया था कि राज्य सरकारें इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा नहीं खटखटा सकतीं, क्योंकि राष्ट्रपति और राज्यपाल के फैसले न्यायिक समीक्षा के दायरे में नहीं आते।