कलकत्ता हाईकोर्ट ने मुकुल रॉय की विधायकी रद्द की, राजनीतिक हलकों में मचा हलचल

कलकत्ता हाईकोर्ट ने मुकुल रॉय की विधायकी रद्द की, राजनीतिक हलकों में मचा हलचल

पश्चिम बंगाल, 13 नवम्बर 2025 । पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा झटका तब लगा जब कलकत्ता हाईकोर्ट ने भाजपा से निर्वाचित होकर बाद में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में शामिल हुए मुकुल रॉय की विधायकी रद्द कर दी। अदालत ने स्पष्ट कहा कि रॉय ने दल-बदल कानून का उल्लंघन किया है और इसलिए उनकी सदस्यता अब मान्य नहीं रहेगी। इस फैसले ने न केवल बंगाल की राजनीति को हिला दिया है बल्कि दल-बदल विरोधी कानून पर भी नई बहस छेड़ दी है।

कलकत्ता हाईकोर्ट ने गुरुवार को दलबदल विरोधी कानून के तहत तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नेता मुकुल रॉय की पश्चिम बंगाल विधानसभा की सदस्यता रद्द कर दी। जस्टिस देबांगसु बसाक की अध्यक्षता वाली डिवीजन बेंच ने विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी और भाजपा विधायक अंबिका रॉय की याचिकाओं पर फैसला दिया।

मुकुल रॉय मई 2021 में भाजपा की टिकट पर विधायक बने थे लेकिन 11 जून 2021 को रॉय और उनके बेटे सुभ्रांशु TMC में शामिल हो गए थे। उन्होंने सीएम ममता बनर्जी और उनके सांसद भतीजे अभिषेक बनर्जी की उपस्थिति में करीब 4 साल बाद घर वापसी की थी। इससे पहले 2017 में वे TMC छोड़कर भाजपा में शामिल हुए थे।

इसके बाद 18 जून 2021 को सुवेंदु अधिकारी ने विधानसभा अध्यक्ष बिमान बनर्जी को मुकुल की सदस्यता खत्म करने को लेकर अर्जी दी थी। उन्होंने दल बदल कानून के तहत सदन में रॉय की सदस्यता को अयोग्य घोषित करने की मांग की थी।

दल बदल कानून क्या है?

1967 में हरियाणा के विधायक गया लाल ने एक दिन में तीन बार पार्टी बदली। उसके बाद से राजनीति में आया राम-गया राम की कहावत मशहूर हो गई। पद और पैसे के लालच में होने वाले दल-बदल को रोकने के लिए राजीव गांधी सरकार 1985 में दल-बदल कानून लेकर आई।

इसमें कहा गया कि अगर कोई विधायक या सांसद अपनी मर्जी से पार्टी की सदस्यता छोड़कर दूसरी पार्टी जॉइन कर लेता है तो वो दल-बदल कानून के तहत सदन से उसकी सदस्यता जा सकती है। अगर कोई सदस्य सदन में किसी मुद्दे पर मतदान के समय अपनी पार्टी के व्हिप का पालन नहीं करता है, तब भी उसकी सदस्यता जा सकती है।

अगर किसी दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्य किसी दूसरे दल में विलय के पक्ष में हों, तो यह दल बदल नहीं माना जाएगा। यह निर्णय लोकसभा अध्यक्ष या विधानसभा अध्यक्ष (या राज्यसभा के मामले में उपसभापति) लेते हैं। उनके निर्णय को न्यायिक समीक्षा के लिए अदालत में चुनौती दी जा सकती है।

कलकत्ता हाईकोर्ट का यह फैसला भारतीय राजनीति में दल-बदल कानून की प्रासंगिकता को फिर से उजागर करता है। मुकुल रॉय का राजनीतिक सफर जहां कई उतार-चढ़ावों से भरा रहा है, वहीं अब यह फैसला उनके करियर का निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है।