दस्तावेज़ों पर टकराव: सरकार का आरोप—नेहरू से जुड़े काग़ज़ात सोनिया गांधी ने अब तक नहीं लौटाए
नई दिल्ली, 18 दिसंबर 2025 । केंद्र सरकार और कांग्रेस के बीच एक बार फिर ऐतिहासिक दस्तावेज़ों को लेकर विवाद गहरा गया है। सरकार ने आरोप लगाया है कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेज़ सोनिया गांधी द्वारा अब तक लौटाए नहीं गए हैं। सरकार का कहना है कि ये काग़ज़ात राष्ट्रीय महत्व के हैं और इन्हें सार्वजनिक अभिलेखागार में सुरक्षित किया जाना चाहिए।
केंद्र सरकार ने बुधवार को साफ किया कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से जुड़े निजी कागजात (पेपर्स) प्रधानमंत्री संग्रहालय और पुस्तकालय (PMML) से गायब नहीं हैं, बल्कि उनका हमें पता है।
सरकार ने कहा कि नेहरू के 51 कार्टन पेपर्स सोनिया गांधी के पास हैं। 2008 में गांधी परिवार के अनुरोध पर ये पेपर्स आधिकारिक तौर पर सौंपे गए थे। अब वे लौटा नहीं रही हैं। वे उनकी निजी संपत्ति नहीं, बल्कि देश की धरोहर हैं।
सरकार ने सोनिया से पेपर्स वापस करने की मांग की है, ताकि नेहरू के समय के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक रिकॉर्ड तक पहुंच आसान हो सके क्योंकि ये दस्तावेज पब्लिक आर्काइव में होने चाहिए, बंद दरवाजों के पीछे नहीं।
केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने X पर एक पोस्ट में 15 दिसंबर को संसद में सांसद संबित पात्रा के उठाए सवाल का लिखित जवाब दिया।
दरअसल, नेहरू पेपर्स भाजपा और कांग्रेस के बीच विवादित मुद्दा रहा है। संबित पात्रा ने संसद में कहा था कि नेहरू से जुड़े कागज प्रधानमंत्री संग्रहालय और पुस्तकालय से गायब हैं।
शेखावत के सोनिया गांधी से सवाल
- जिस बात का जवाब चाहिए वह यह है, PMML की तरफ से कई बार याद दिलाने के बावजूद, ये कागजात वापस क्यों नहीं किए गए? देश को सच्चाई जानने का हक है।
- यह मामूली बात नहीं है। इतिहास चुनिंदा तरीके से नहीं दिखाया जा सकता। पारदर्शिता लोकतंत्र की नींव है। आर्काइव में खुलापन इसकी नैतिक जिम्मेदारी है जिसे गांधी परिवार को निभाना चाहिए।
- सोनिया जी देश को बताएं, क्या छिपाया जा रहा है। इन कागजात को वापस न करने के जो बहाने दिए जा रहे हैं, वे मानने लायक नहीं हैं। दस्तावेज अभी भी पब्लिक आर्काइव से बाहर क्यों हैं।
सरकारी पक्ष के अनुसार, नेहरू से संबंधित ये दस्तावेज़ शोध, इतिहास लेखन और सार्वजनिक हित के लिहाज से अत्यंत अहम हैं। आरोप है कि ये काग़ज़ात निजी तौर पर रखे गए हैं, जबकि नियमों के मुताबिक ऐसे अभिलेखों को राष्ट्रीय धरोहर मानते हुए सरकारी संग्रह में होना चाहिए। सरकार का तर्क है कि इससे पारदर्शिता और ऐतिहासिक तथ्यों की सही समझ सुनिश्चित होती है।
वहीं कांग्रेस की ओर से इस मुद्दे पर आपत्ति जताई गई है। पार्टी का कहना है कि नेहरू से जुड़े कई दस्तावेज़ पारिवारिक और निजी प्रकृति के हैं, जिन्हें लेकर सरकार राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि सरकार इतिहास को लेकर चयनात्मक रवैया अपना रही है और इस मुद्दे को बेवजह तूल दिया जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, यह विवाद केवल दस्तावेज़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे व्यापक राजनीतिक संदेश और वैचारिक टकराव भी है। एक ओर सरकार राष्ट्रीय अभिलेखों की सुरक्षा और सार्वजनिक पहुंच की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष इसे निजी अधिकार और राजनीतिक प्रतिशोध से जोड़कर देख रहा है।
इस पूरे मामले में अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या कोई औपचारिक कानूनी प्रक्रिया अपनाई जाएगी या दोनों पक्ष बातचीत के जरिए समाधान निकालेंगे। फिलहाल यह मुद्दा संसद से लेकर राजनीतिक गलियारों तक चर्चा का केंद्र बना हुआ है।


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