राहुल के खिलाफ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव नहीं लाया जाएगा, सियासी अटकलों पर विराम

राहुल के खिलाफ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव नहीं लाया जाएगा, सियासी अटकलों पर विराम

नई दिल्ली, 12 फ़रवरी 2026 । कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ विशेषाधिकार हनन (Breach of Privilege) का प्रस्ताव लाए जाने की चर्चाओं पर फिलहाल विराम लग गया है। संसदीय सूत्रों के अनुसार, इस मुद्दे पर प्रस्ताव लाने की संभावना नहीं है, जिससे संसद के भीतर चल रही अटकलों को विराम मिला है।

BJP सांसद निशिकांत दुबे ने गुरुवार को राहुल गांधी के खिलाफ लोकसभा में सब्सटेंसिव मोशन पेश किया है। राहुल पर देश को गुमराह करने का आरोप लगाया है। दुबे ने राहुल की संसद सदस्यता खत्म करने और चुनाव लड़ने पर लाइफटाइम बैन लगाने की मांग की है।

मीडिया सूत्रों के मुताबिक, सरकार राहुल के खिलाफ सदन में उनकी स्पीच के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का नोटिस नहीं लाएगी। इस पर प्रियंका गांधी ने कहा कि मोदीजी ने छाती 56 इंच की नपवाई थी। उनके खिलाफ भी प्रस्ताव आना चाहिए।

हालांकि, बीजेपी उनके (राहुल) भाषण से आपत्तिजनक हिस्से हटाने को लेकर अब भी अड़ी हुई है, क्योंकि उन्होंने अब तक अपने आरोपों को लेकर सबूत पेश नहीं किए हैं। बीजेपी के चीफ व्हिप संजय जायसवाल ने राहुल के बजट चर्चा के दौरान कहे गए कुछ अंशों को रिकॉर्ड से हटाने का औपचारिक नोटिस दिया है।

इससे पहले, संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू ने X पर एक वीडियो पोस्ट किया है। जिसमें 4 फरवरी को लोकसभा स्पीकर के चैंबर में हंगामे का जिक्र है। रिजिजू ने दावा किया है कि विपक्षी सांसदों ने प्रियंका गांधी की मौजूदगी में गालियां दीं।

विशेषाधिकार हनन का मामला तब उठता है जब किसी सांसद के बयान या कार्रवाई को सदन की गरिमा, अधिकारों या विशेषाधिकारों के खिलाफ माना जाता है। ऐसे मामलों में नोटिस दिया जाता है और स्पीकर या सभापति यह तय करते हैं कि उसे स्वीकार कर विशेषाधिकार समिति को भेजा जाए या नहीं। हालांकि वर्तमान मामले में ऐसा कदम उठाने की संभावना से इनकार किया गया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संसद के सुचारू संचालन और टकराव से बचने के लिए यह फैसला लिया गया हो सकता है। यदि प्रस्ताव आता, तो यह सदन में तीखी बहस और राजनीतिक ध्रुवीकरण का कारण बन सकता था। अब ध्यान आगामी विधायी कार्य और अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर केंद्रित रहने की संभावना है।

यह घटनाक्रम दर्शाता है कि संसदीय प्रक्रिया में हर विवाद औपचारिक प्रस्ताव तक नहीं पहुंचता और कई बार राजनीतिक स्तर पर ही समाधान तलाश लिया जाता है।