वादों से विश्वासघात तक: नारी शक्ति का अधूरा संकल्प — सीएम रेखा गुप्ता का तीखा बयान

वादों से विश्वासघात तक: नारी शक्ति का अधूरा संकल्प — सीएम रेखा गुप्ता का तीखा बयान

नई दिल्ली, 04 मई 2026 । महिला सशक्तिकरण और राजनीतिक जवाबदेही को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। रेखा गुप्ता ने सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि नारी शक्ति को लेकर किए गए वादे अब “विश्वासघात” में बदलते नजर आ रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और आत्मनिर्भरता के मुद्दों पर घोषणाएं तो बड़ी-बड़ी की गईं, लेकिन जमीनी स्तर पर अपेक्षित परिणाम देखने को नहीं मिल रहे।

17 अप्रैल 2026 का दिन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज हो चुका है। बाबा साहेब आंबेडकर की जयंती वाले सप्ताह में, जब करोड़ों बेटियाँ संसद की ओर आश भरी निगाहों से देख रही थीं, 131वां संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा की दहलीज पर ही ठिठक गया। अत्यंत दुःखद है कि प्रधानमंत्री को विपक्ष की बाधाओं के कारण देश से क्षमा मांगनी पड़ी।

महिला आरक्षण का इतिहास भारतीय राजनीति की सबसे लंबी टालमटोल की कहानी है। 1996 में पहली बार प्रस्तुत हुआ, 1998, 1999, 2002 और 2003 में बार-बार लाया और रोका गया, 2010 में राज्यसभा से पारित होने के बावजूद लोकसभा की दहलीज न लांघ सका। यह 'नौ दिन चले अढ़ाई कोस' जैसा था, हर बार किसी न किसी 'तकनीकी' आपत्ति ने इस मूल नैतिक प्रश्न को उलझा दिया।

उन्होंने कहा कि महिला सशक्तिकरण केवल नारे तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसके लिए ठोस नीतियां, बेहतर सुरक्षा तंत्र और आर्थिक अवसरों का विस्तार जरूरी है। उनका दावा है कि कई योजनाएं या तो अधूरी रह गई हैं या उनका प्रभाव सीमित रहा है, जिससे आम महिलाओं को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाया।

रेखा गुप्ता ने यह भी कहा कि महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामलों में सख्त कार्रवाई और त्वरित न्याय की व्यवस्था अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। उन्होंने सरकार से मांग की कि महिला सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए ठोस और प्रभावी कदम उठाए जाएं, ताकि समाज में भरोसा कायम हो सके।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस तरह के बयान आगामी चुनावों से पहले राजनीतिक माहौल को गर्माने का संकेत हैं। महिला मतदाताओं को साधने और उनके मुद्दों को केंद्र में लाने की कोशिश के तौर पर भी इसे देखा जा रहा है।

इस बयान ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या नारी सशक्तिकरण केवल घोषणाओं तक सीमित रह गया है, या वास्तव में जमीनी बदलाव के लिए और अधिक प्रयासों की जरूरत है।