अमेरिकी संकेत से वैश्विक तेल बाजार में हलचल, सभी देशों को रूसी तेल खरीदने की इजाजत
नई दिल्ली, 13 मार्च 2026 । वैश्विक ऊर्जा बाजार को लेकर बड़ा संकेत देते हुए United States ने कहा है कि सभी देश Russia से कच्चा तेल खरीद सकते हैं। इस बयान के बाद अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार और ऊर्जा नीति को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है।
अमेरिका-इजराइल की ईरान से चल रही जंग की वजह से दुनियाभर में कच्चे तेल की कीमतें बढ़कर 100 डॉलर के पार चली गई हैं। इसे काबू में करने के लिए ट्रम्प प्रशासन ने दूसरे देशों को भी रूस से तेल खरीदने की अस्थाई मंजूरी दे दी है। रूस के कई ऑयल टैंकर समुद्र में फंसे हैं।
इससे पहले अमेरिका ने भारत को रूस से कच्चा तेल खरीदने के लिए प्रतिबंधों में ढील देने की बात कही थी। हालांकि, इस पर भारतीय अधिकारी कह चुके हैं कि भारत तेल खरीदने के लिए किसी भी देश की इजाजत पर निर्भर नहीं है।
सिर्फ समुद्र में फंसे जहाजों से तेल खरीदने की मंजूरी
अमेरिकी ट्रेजरी विभाग (वित्त मंत्रालय) ने गुरुवार को एक लाइसेंस जारी किया। इसके तहत उन रूसी कच्चे तेल और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की डिलीवरी और बिक्री की जा सकती है, जो 12 मार्च की रात 12:01 बजे से पहले जहाजों पर लोड हो चुके थे।
यह छूट सिर्फ 11 अप्रैल तक के लिए दी गई है। अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने बताया कि इसका मकसद दुनियाभर में तेल की सप्लाई बढ़ाना है, ताकि बढ़ती कीमतों पर लगाम लग सके।
यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर पश्चिमी देशों ने कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे, जिनमें ऊर्जा क्षेत्र भी शामिल था। हालांकि समय के साथ वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और तेल की कीमतों को संतुलित रखने के लिए विभिन्न देशों ने अलग-अलग रणनीतियां अपनाईं। अमेरिका के इस संकेत को भी उसी संदर्भ में देखा जा रहा है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि रूस दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादकों में से एक है और कई देशों की ऊर्जा जरूरतें उससे जुड़ी हुई हैं। ऐसे में यदि विभिन्न देशों को रूसी तेल खरीदने की अनुमति मिलती है तो इससे वैश्विक तेल आपूर्ति स्थिर रखने में मदद मिल सकती है।
कई देश, खासकर India और एशिया के अन्य आयातक, पहले से ही रूस से कच्चा तेल खरीद रहे हैं। रियायती दरों पर मिलने वाले तेल के कारण यह कई अर्थव्यवस्थाओं के लिए महत्वपूर्ण विकल्प बना हुआ है।
विश्लेषकों के मुताबिक इस तरह के संकेत से वैश्विक ऊर्जा बाजार में संतुलन बनाए रखने की कोशिश दिखाई देती है। साथ ही यह भी माना जा रहा है कि ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हितों के चलते कई देश अपनी तेल खरीद नीति को व्यावहारिक दृष्टिकोण से तय कर रहे हैं।


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