सरकार मानसून में नकली बारिश कराएगी 

" आलोक गौड़ "

" कबीरा खड़ा बाजार में मांगे सबकी खैर,
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर। " 

नई दिल्ली। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और उनके नौसिखिया मंत्री ऐसे हास्यास्पद फैसले ले रहे हैं, जिनकी वजह से न केवल जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपए व्यर्थ हो रहे हैं,  बल्कि इन फैसलों को देख कर लोगों के मन में यह संशय भी पैदा होने लगा है कि क्या समय के साथ रेखा गुप्ता सरकार उनकी अपेक्षाओं के अनुरूप काम कर पाएगी, या फिर उन्हें पूरे पांच साल तक सरकार की खामियों का खामियाजा भुगतना पड़ेगा।
दिल्ली में वायु प्रदूषण कम करने और यहां की हवा की गुणवत्ता में सुधार लाने के मकसद से सरकार ने नकली बारिश कराने का प्रयोग करने का फैसला लिया है। इस काम पर 3.21 करोड़ रुपए खर्च होंगे।
यह प्रयोग आईआईटी कानपुर की मदद से किया जाएगा। इसके लिए भारतीय मौसम विभाग से अनुमति ले ली गई है। जबकि नागरिक उड्डयन महानिदेशालय से अनुमति मिलनी अभी बाकी है। यह अनुमति मिलते ही 4 से 10 जुलाई के बीच नकली बारिश करवाई जाएगी।
मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और उनके पर्यावरण मंत्री मनजिंदर सिंह इस बात से अनजान तो नहीं होंगे कि दिल्ली में मानसून 29 जून के बाद से पूरी तरह से सक्रिय हो जाता है। इतना ही नहीं जुलाई के महीने में तो बकायदा झमाझम बरसात होती है। ऐसे में नकली बारिश करवाने का प्रयोग कराने का औचित्य समझ से परे है। 
मानसून में नकली बारिश कराने का प्रयोग सफल रहा या असफल इसका आकलन कैसे और किस आधार पर किया जाएगा यह तो मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता या फिर पर्यावरण मंत्री सिरसा ही बता सकते हैं। क्योंकि पर्यावरण विद व  वैज्ञानिक दिल्ली सरकार के जुलाई में नकली बारिश करवाने के फैसले को पूरी तरह से गलत और अतर्कसंगत करार देते हैं।
पर्यावरण एवं हरित ऊर्जा पर काम करने वाले अंतरराष्ट्रीय स्तर के भारतीय वैज्ञानिक आर के कोटवाला के मुताबिक अगर रेखा सरकार नकली बारिश कराने का प्रयोग नवंबर से जनवरी महीने के दौरान कराती तो ज्यादा कारगर रहता। क्योंकि नवंबर से जनवरी के दौरान पड़ोसी राज्यों में खेतों में पराली जलाने की वजह से न केवल दिल्ली में वायु प्रदूषण की मात्रा काफी बढ़ जाती है, बल्कि वायु की गुणवत्ता का सूचकांक भी 700 से 1000 अंक तक पहुंच जाता है। 
उनके मुताबिक अरविंद केजरीवाल ने अपने कार्यकाल के दौरान आईआईटी के अपने मित्रों को फायदा पहुंचाने के लिए वायु प्रदूषण कम करने के नाम पर करोड़ों रुपए खर्च कर दिए थे। इसके उदाहरण के तौर पर कनॉट प्लेस के बाबा खड़क सिंह मार्ग पर लगे एयरप्यूरिफायर को देखा जा सकता है। इसे बनाने पर करोड़ों रुपए खर्च किए गए थे। यह आज बंद पड़ा है।
वैसे तो नकली बारिश करवाने के लिए जिन रासायनिक पदार्थों का उपयोग किया जाता है, त्वचा रोग विशेषज्ञ चिकित्सक उन्हें मनुष्यों की त्वचा के लिए हानिकारक मानते हैं।
एड्स हेल्थकेयर फाउंडेशन के निदेशक डा. वी सैम प्रसाद के मुताबिक नकली बारिश कराने के लिए सिल्वर आयोडाइज, पोटेशियम आयोडाइज, शुष्क बर्फ (ठोस कार्बन डाई आक्साइड) टेबल नमक जैसे रासायनिक पदार्थों का उपयोग किया जाता है। इनके त्वचा के संपर्क में आने से कई तरह के चर्म रोग होने का खतरा काफी बढ़ जाता है।
वायु प्रदूषण के मामले में पिछली सरकार ने भी न तो कोई ठोस कदम उठाए और न ही दीर्घकालिक योजना बना कर उस पर अमल किया। यही वजह है कि दिल्ली में लगातार बिगड़ती हवा की गुणवत्ता को देखकर सर्वोच्च न्यायालय को भी यह कहना पड़ा कि राजधानी गैस चेंबर बन गई। यहां की हवा में सांस लेने से दम घुटने लगता है।
ऐसा लगता है कि रेखा सरकार भी पिछली सरकार के नक्शे कदम पर चल रही है। यह ही वजह है के वायु प्रदूषण पर नियंत्रण रखने के लिए ठोस नीति बनाने के बजाय मानसून में नकली बारिश करवा खुद को व दिल्लीवासियों को धोखा देने का प्रयास कर रही है।