बकरीद से पहले कलकत्ता हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी, कहा- गाय की कुर्बानी ईद का अनिवार्य हिस्सा नहीं

बकरीद से पहले कलकत्ता हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी, कहा- गाय की कुर्बानी ईद का अनिवार्य हिस्सा नहीं

कलकत्ता, 22 मई 2026 । कलकत्ता हाईकोर्ट ने बकरीद से पहले पशु वध से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि गाय की कुर्बानी ईद-उल-अजहा का अनिवार्य धार्मिक हिस्सा नहीं है। अदालत की इस टिप्पणी के बाद मामला चर्चा का विषय बन गया है और विभिन्न सामाजिक तथा राजनीतिक हलकों में इस पर प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा है कि राज्य सरकार जनहित को ध्यान में रखते हुए पशु बलि को सीमित कर सकती है। अदालत ने निर्देश दिया है कि अब से सड़कों, गलियों या किसी भी सार्वजनिक स्थान पर पशुओं का वध या कुर्बानी नहीं दी जा सकेगी। इसके लिए सरकार द्वारा केवल नामित और सुरक्षित स्थानों का ही उपयोग करने की अनुमति होगी।

हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन कानून और सार्वजनिक व्यवस्था का पालन भी उतना ही जरूरी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जिन राज्यों में गोहत्या पर प्रतिबंध लागू है, वहां संबंधित कानूनों का पालन अनिवार्य होगा। कोर्ट की टिप्पणी को बकरीद से पहले महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

मामला कथित तौर पर पशु वध और गोहत्या से जुड़े नियमों को लेकर दायर याचिका से जुड़ा था। अदालत ने कहा कि त्योहारों के दौरान प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी तरह से कानून व्यवस्था प्रभावित न हो और सभी गतिविधियां निर्धारित नियमों के अनुसार संचालित हों।

भारत के कई राज्यों में गोहत्या को लेकर अलग-अलग कानून लागू हैं। कुछ राज्यों में पूर्ण प्रतिबंध है, जबकि कुछ जगहों पर विशेष शर्तों के तहत अनुमति दी जाती है। ऐसे में अदालत का यह बयान कानूनी और सामाजिक दोनों दृष्टि से अहम माना जा रहा है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हाईकोर्ट की यह टिप्पणी धार्मिक आयोजनों और राज्य के कानूनों के बीच संतुलन बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत देती है। वहीं प्रशासन ने भी त्योहार को शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न कराने के लिए सुरक्षा और निगरानी बढ़ाने की तैयारी शुरू कर दी है।

बकरीद के मौके पर हर साल देशभर में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की जाती है ताकि किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना को रोका जा सके। इस बीच अदालत के फैसले ने एक बार फिर धार्मिक परंपराओं और संवैधानिक प्रावधानों को लेकर बहस तेज कर दी है।