यूरोप की सबसे ताकतवर जोड़ी फ्रांस-जर्मनी टूटने के करीब — नेतृत्व मतभेद, राजनीति और रणनीतिक असहमति गहराती चुनौतियाँ
बर्लिन, 24 जनवरी 2026 । यूरोप की दीर्घकालिक रणनीति और वैश्विक भूमिका के केंद्र रहे फ्रांस और जर्मनी के बीच सहयोग में हाल के समय में स्पष्ट दरार और मतभेद देखे जा रहे हैं, जिससे यह यूरोपीय संघ (EU) के लिए सबसे ताकतवर जोड़ी कही जाने वाली इस साझेदारी को संकट में डाल रहा है। दोनों देशों के बीच विभिन्न राजनीतिक, नीति-आधारित और रणनीतिक मुद्दों पर असहमति गहराती जा रही है, जिसका प्रभाव न केवल ईयू की निर्णय-प्रक्रियाओं पर पड़ रहा है, बल्कि यूरोप की वैश्विक प्रभावकारिता पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहा है।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से जर्मनी और फ्रांस यूरोप की सबसे ताकतवर जोड़ी मानी जाती रही है। लेकिन अब इसमें दरार आने लगी है। यूरो न्यूज के मुताबिक जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज अब इटली की दक्षिणपंथी प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी के साथ दोस्ती बढ़ा रहे हैं।
मर्ज ने इसका इशारा दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के मंच से ही कर दिया था। उन्होंने कहा कि 23 जनवरी को रोम में होने वाली इटली-जर्मनी समिट में वह और मेलोनी मिलकर यूरोपीय यूनियन को बेहतर और अलग तरीके से चलाने के लिए कुछ नए सुझाव सामने रखेंगे।
अमेरिकी वेबसाइट द पॉलिटिको के मुताबिक मर्ज-मेलोनी दोनों ही दक्षिणपंथी सोच वाले हैं, अमेरिका के साथ रिश्तों को जरूरी मानते हैं और ट्रम्प के साथ टकराव से बचना चाहते हैं। इसके अलावा दोनों की फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से कुछ न कुछ नाराजगी भी है।
यही वजह है कि पहले जर्मनी यूरोपीय नीति तय करने के लिए फ्रांस की ओर देखता था। लेकिन अब व्यापार, उद्योग और अमेरिका से रिश्तों जैसे मुद्दों पर आगे बढ़ने के लिए इटली के साथ खड़ा दिख रहा है। इसके साथ ही राजनीतिक अस्थिरता और घर के भीतर की चुनौतियाँ भी इस साझेदारी पर दबाव बना रही हैं। फ्रांस में राजनीतिक संकट और नेतृत्व की उथल-पुथल ने देश की स्थिरता को प्रभावित किया है, जबकि जर्मनी अपनी सुरक्षा-बढ़ाने की रणनीति पर जोर दे रहा है, जिससे न केवल उसकी प्राथमिकताएँ बदल रही हैं, बल्कि EU में अन्य भागीदारों के साथ नीतिगत तालमेल कठिन हो रहा है।
एक और महत्वपूर्ण उदाहरण रक्षा और औद्योगिक सहयोग का है। फ्रांस-जर्मनी की साझेदारी पर आधारित FCAS (Future Combat Air System) जैसे संयुक्त रक्षा प्रोजेक्ट पर भी मतभेद उभर आए हैं, जहां फ्रांस ने संकेत दिया है कि अगर जर्मनी के साथ समझौता नहीं हुआ तो वह प्रोजेक्ट को अकेले आगे बढ़ाने को तैयार है, जो इस साझेदारी की तकनीकी और रणनीतिक स्तर पर दरार को दिखाता है।
इसलिए आज फ्रांस-जर्मनी की जोड़ी कई मायनों में टूटने के करीब मानी जा रही है—जहाँ नीति और प्राथमिकताओं में असहमति, राजनीतिक दबाव और साझा परियोजनाओं के विवाद ने इस पारंपरिक यूरोपीय धुरी को चुनौती दी है।


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