हाईकोर्ट की टिप्पणी – शादी के बाद साथ नहीं रहे तो विवाह पंजीकरण महज़ औपचारिकता
नई दिल्ली, 29 जनवरी 2026 । एक अहम मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि शादी के बाद पति-पत्नी ने वैवाहिक जीवन साथ बिताया ही नहीं, तो केवल विवाह पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन) अपने आप में वैवाहिक संबंध की वास्तविकता साबित नहीं करता, बल्कि वह एक औपचारिक प्रक्रिया भर रह जाती है। अदालत ने संकेत दिया कि वैवाहिक रिश्ते का मूल्यांकन सिर्फ दस्तावेज़ों से नहीं, बल्कि वास्तविक सहजीवन (cohabitation) और दांपत्य संबंधों के आधार पर भी किया जाता है।
दिल्ली हाइकोर्ट ने कहा कि शादी के बाद अगर पति पत्नी साथ नहीं रह रहे हैं तो शादी की रजिस्ट्रेशन एक औपचारिकता से ज्यादा कुछ भी नहीं है।
जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रेनू भटनागर की डिवीजन बेंच ने कहा कि इसका इस्तेमाल एक साल में तलाक लेने से इनकार करने के लिए नहीं किया जा सकता।
हाइकोर्ट बुधवार को एक महिला की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। महिला ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें शादी की तारीख से एक साल पूरा होने से पहले आपसी सहमति से तलाक के लिए ज्वाइंट याचिका पेश करने की अनुमति खारिज कर दी गई थी।
याचिका में कहा गया कि दोनों पक्ष कभी एक दिन भी साथ नहीं रहे, शादी कभी पूरी नहीं हुई, और दोनों शादी के तुरंत बाद अपने-अपने माता-पिता के घरों में अलग-अलग रहने लगे।
हाईकोर्ट की इस टिप्पणी का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि कई मामलों में विवाह पंजीकरण को ही अंतिम प्रमाण मान लिया जाता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि विवादों—जैसे गुजारा भत्ता, वैवाहिक अधिकारों की बहाली, या वैवाहिक धोखाधड़ी—में तथ्यात्मक परिस्थितियों की जांच जरूरी है। सिर्फ रजिस्ट्रेशन के आधार पर हर अधिकार या दायित्व स्वतः स्थापित नहीं हो जाता।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह दृष्टिकोण परिवार कानून में “इंटेंट” (इरादा) और “कंसमेशन/सहजीवन” जैसे पहलुओं को महत्व देता है। इससे उन मामलों में स्पष्टता आ सकती है जहां विवाह केवल कागज़ों पर हुआ, लेकिन दंपति ने वास्तविक जीवन साझा नहीं किया। हालांकि, हर मामला अपने तथ्यों पर निर्भर करेगा और यह टिप्पणी सार्वभौमिक नियम नहीं मानी जाएगी।
यह फैसला वैवाहिक विवादों में अदालतों के उस रुख को दर्शाता है जहां सामाजिक वास्तविकताओं और व्यक्तिगत परिस्थितियों को कानूनी दस्तावेजों जितना ही महत्व दिया जा रहा है।


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