इमाम का बयान—जहां ‘वंदे मातरम्’ अनिवार्य, वहां से बच्चों को निकालें
उज्जैन, 14 फ़रवरी 2026 । एक स्थानीय इमाम के हालिया बयान ने बहस छेड़ दी है। कथित तौर पर उन्होंने कहा कि जिन शिक्षण संस्थानों में ‘वंदे मातरम्’ अनिवार्य किया जाता है, वहां से अभिभावकों को अपने बच्चों को निकालने पर विचार करना चाहिए। बयान सामने आने के बाद सामाजिक और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं तेज हो गईं।
केंद्र सरकार ने 28 जनवरी को राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर नए दिशानिर्देश जारी किए हैं। इनके मुताबिक, अब सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों या अन्य औपचारिक आयोजनों में ‘वंदे मातरम्’ बजाया जाएगा। इस दौरान हर व्यक्ति का खड़ा होना अनिवार्य होगा।
उज्जैन के इमाम मुफ्ती सैय्यद नासिर अली नदवी ने इस आदेश को इस्लाम विरोधी बताया है। उन्होंने कहा- यह आदेश हमारी धार्मिक आजादी पर हमला है। वंदे मातरम् में कहा गया है कि हिंदुस्तान की भूमि की हम पूजा करते हैं, लेकिन मुसलमान के लिए यह बिल्कुल भी सही नहीं है कि वह अल्लाह के साथ किसी और को शरीक कर अपनी पूजा में शामिल करे।
हम कहेंगे कि जिन स्कूलों में वंदे मातरम् को अनिवार्य किया जा रहा है, वहां से सभी मुसलमान अपने बच्चों को निकाल लें। हम इसकी इजाजत नहीं दे सकते कि वह इस्लाम में रहकर किसी और खुदा की इबादत करे। यह फैसला कानून के खिलाफ है। मेरी सरकार से गुजारिश है कि अपना फैसला वापस ले। ‘वंदे मातरम्’ मूल रूप से आनंदमठ से लिया गया है, जिसे बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1882 में लिखा था। 1950 में संविधान सभा ने इसे भारत का राष्ट्रीय गीत (National Song) का दर्जा दिया। सुप्रीम कोर्ट के 1986 के एक फैसले (बिजो एमैनुअल केस) में यह स्पष्ट किया गया था कि किसी भी छात्र को उसकी धार्मिक आस्था के खिलाफ कुछ गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, बशर्ते वह शांति और अनुशासन बनाए रखे।


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