वैवाहिक कानून पर अहम टिप्पणी: तलाक के लिए एक साल अलग रहना अनिवार्य नहीं — दिल्ली हाईकोर्ट

वैवाहिक कानून पर अहम टिप्पणी: तलाक के लिए एक साल अलग रहना अनिवार्य नहीं — दिल्ली हाईकोर्ट

नई दिल्ली, 18 दिसंबर 2025 । दिल्ली हाईकोर्ट ने तलाक से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि तलाक के लिए पति-पत्नी का एक साल तक अलग रहना हर स्थिति में अनिवार्य शर्त नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून का उद्देश्य पक्षकारों को अनावश्यक रूप से लंबे समय तक पीड़ा में रखना नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण और व्यावहारिक समाधान देना है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को कहा कि आपसी सहमति से तलाक लेने वाले पति पत्नी के लिए एक साल तक अलग रहने की शर्त अनिवार्य नहीं है। कोर्ट ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम (HMA), 1955 के तहत बनाए गए इस शर्त को सही मामलों में माफ किया जा सकता है।

कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसी परिस्थितियों में, पति-पत्नी को शादी के बंधन से मुक्त करने के बजाय, उन्हें एक गलत रिश्ते में उलझाए रखना गलत होगा। इससे दोनों पर अनावश्यक मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक तनाव पड़ेगा।

यह स्पष्टीकरण एक डिवीजन बेंच द्वारा किए गए एक रेफरेंस के जवाब में आया, जिसमें अधिनियम के तहत आपसी सहमति से तलाक के लिए याचिका पेश करने की समयसीमा पर मार्गदर्शन मांगा गया था।

कोर्ट ने यह टिप्पणी उस मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें दंपती के बीच लंबे समय से गंभीर मतभेद और वैवाहिक संबंध पूरी तरह टूट चुके थे। अदालत ने माना कि जब यह स्पष्ट हो जाए कि विवाह पूरी तरह से विफल हो चुका है और साथ रहने की कोई वास्तविक संभावना नहीं बची है, तो केवल समय की औपचारिक शर्त के आधार पर तलाक को टालना उचित नहीं होगा।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया

सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए, बेंच ने कहा कि धारा 13B(1), जो इस अधिनियम के प्रावधानों के अधीन शब्दों से शुरू होती है, उसे HMA की धारा 14(1) की शर्तों के तहत ढंग से पढ़ा जाना चाहिए।

धारा 14(1) अदालतों को याचिकाकर्ता को "असाधारण कठिनाई" या प्रतिवादी की ओर से "असाधारण दुराचार" वाले मामलों में कानूनी प्रतीक्षा अवधि को माफ करने का अधिकार देती है।

कोर्ट ने तर्क दिया कि भले ही पति-पत्नी आपसी सहमति से तलाक के लिए कोर्ट आते हैं, लेकिन अलग होने का उनका फैसला निश्चित रूप से किसी कारण पर आधारित होता है।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि कानून में दिए गए प्रावधानों की व्याख्या करते समय सामाजिक वास्तविकताओं और मानवीय पहलुओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कई मामलों में अलग-अलग रहना केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है, जबकि मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक रूप से पति-पत्नी पहले ही अलग हो चुके होते हैं।

अदालत के अनुसार, जब दोनों पक्ष आपसी सहमति से या ठोस आधार पर विवाह समाप्त करना चाहते हैं और यह साबित हो जाता है कि रिश्ते को बचाने की कोई गुंजाइश नहीं है, तो अदालत को मामले के तथ्यों के आधार पर निर्णय लेने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। इससे अनावश्यक मुकदमेबाजी और मानसिक तनाव को भी कम किया जा सकता है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली हाईकोर्ट की यह टिप्पणी पारिवारिक कानून के मामलों में एक व्यावहारिक दृष्टिकोण को दर्शाती है। इससे भविष्य में ऐसे दंपतियों को राहत मिल सकती है, जो औपचारिक समयसीमा के कारण वर्षों तक कानूनी प्रक्रिया में उलझे रहते हैं।

यह फैसला तलाक कानूनों की व्याख्या में लचीलापन लाने और न्याय को अधिक मानवीय बनाने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।