फिल्म ‘धुरंधर’ के बैन को लेकर प्रधानमंत्री मोदी को पत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर उठे सवाल
नई दिल्ली, 08 जनवरी 2026 । फिल्म ‘धुरंधर’ पर लगाए गए प्रतिबंध को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। इस मुद्दे पर अब मामला सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक पहुंच गया है। फिल्म के बैन के विरोध में एक औपचारिक पत्र प्रधानमंत्री को भेजा गया है, जिसमें इस फैसले पर पुनर्विचार की मांग की गई है। पत्र में कहा गया है कि किसी फिल्म को रिलीज से पहले या बाद में बैन करना लोकतांत्रिक मूल्यों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ है।
इंडियन मोशन पिक्चर प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (IMPPA) ने पीएम नरेंद्र मोदी से फिल्म धुरंधर के बैन के मामले में दखल देने की अपील की है। एसोसिएशन ने कहा है कि इस फिल्म पर कुछ मिडिल ईस्ट देशों में लगाया गया बैन सही नहीं है।
IMPPA ने अपने पत्र में कहा कि फिल्म पर यूएई, सऊदी अरब, कतर, ओमान, कुवैत और बहरीन में रोक लगाई गई है। एसोसिएशन का कहना है कि यह फैसला एकतरफा है और इसे जल्द हटाया जाना चाहिए। इसके लिए सरकार से कूटनीतिक स्तर पर बात करने की मांग की गई है।
एसोसिएशन ने यह भी बताया कि धुरंधर को भारत में सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन से मंजूरी मिली थी। फिल्म रिलीज के बाद बॉक्स ऑफिस पर काफी सफल रही। IMPPA का कहना है कि विदेशों में बैन से अभिव्यक्ति की आजादी पर असर पड़ता है। साथ ही इससे विदेशी बाजार में काम करने वाले भारतीय फिल्म निर्माताओं को नुकसान होता है।
पत्र लिखने वालों का कहना है कि यदि किसी फिल्म से किसी वर्ग या संस्था को आपत्ति है, तो उसके लिए कानूनी और संवैधानिक रास्ते मौजूद हैं। सीधे बैन लगाना संवाद की संभावनाओं को खत्म कर देता है। उन्होंने यह भी कहा कि सेंसर बोर्ड द्वारा प्रमाणन के बाद किसी फिल्म पर रोक लगना सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करता है।
इस पूरे मामले को सिर्फ एक फिल्म तक सीमित न मानते हुए, पत्र में इसे रचनात्मक स्वतंत्रता से जोड़कर देखा गया है। लेखकों और कलाकारों का मानना है कि अगर ऐसे प्रतिबंधों का सिलसिला चलता रहा, तो भविष्य में संवेदनशील लेकिन जरूरी मुद्दों पर फिल्म बनाना लगभग असंभव हो जाएगा।
प्रधानमंत्री से अपील की गई है कि वह इस मामले में हस्तक्षेप करें और यह सुनिश्चित करें कि कला, सिनेमा और अभिव्यक्ति की आज़ादी को राजनीतिक या वैचारिक दबाव में कुचला न जाए। साथ ही, फिल्म ‘धुरंधर’ पर लगाए गए बैन को हटाकर दर्शकों को खुद फैसला करने का अधिकार दिया जाए।
अब देखना होगा कि केंद्र सरकार और संबंधित संस्थाएं इस पत्र पर क्या रुख अपनाती हैं। लेकिन इतना तय है कि ‘धुरंधर’ का मुद्दा सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि देश में रचनात्मक आज़ादी बनाम प्रतिबंध की बड़ी बहस का रूप ले चुका है।


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