मद्रास हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी: लिव-इन में महिला तभी सुरक्षित, जब उसे पत्नी जैसा दर्जा मिले

मद्रास हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी: लिव-इन में महिला तभी सुरक्षित, जब उसे पत्नी जैसा दर्जा मिले

चेन्नई, 21 जनवरी 2026 । लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर मद्रास हाईकोर्ट की एक टिप्पणी ने कानूनी और सामाजिक बहस को तेज कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही महिला की सुरक्षा तभी सुनिश्चित हो सकती है, जब उसे पत्नी के समान माना जाए। अदालत का यह अवलोकन महिलाओं के अधिकार, सामाजिक सुरक्षा और मौजूदा कानूनों की सीमाओं को उजागर करता है।

मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं को सुरक्षा तभी मिलेगी, जब उन्हें पत्नी का दर्जा दिया जाए। कोर्ट ने कहा कि ऐसे रिश्तों में महिलाओं को वैवाहिक सुरक्षा नहीं मिल पाती इसलिए कोर्ट की जिम्मेदारी बनती है कि महिलाओं को संरक्षण दें।

जस्टिस एस श्रीमथी ने यह टिप्प्णी एक आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए की। शख्स पर आरोप है कि वह महिला के साथ पहले लिव-इन में रहा। फिर शादी का झूठा वादा कर महिला के साथ शारीरिक संबंध बनाए।

इस पर कोर्ट ने कहा कि पुरुष पहले मॉडर्न बनकर लिव-इन का रिश्ता बनाते हैं। बाद में रिलेशनशिप खराब होने पर महिला के कैरेक्टर पर सवाल उठाते हैं। वे ऐसा इसलिए कर पाते हैं क्योंकि कानून में लिव-इन को लेकर कोई नियम नहीं हैं।

कोर्ट की सोच क्या है?

मद्रास हाईकोर्ट का मानना है कि सिर्फ साथ रहने से महिला को अपने आप कानूनी सुरक्षा नहीं मिल जाती। अगर लिव-इन संबंध लंबे समय तक चला हो और उसमें पति-पत्नी जैसे तत्व मौजूद हों, तो महिला को संरक्षण देने के लिए उसे पत्नी जैसा दर्जा देना जरूरी हो जाता है। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि कानून की व्याख्या करते समय महिलाओं की सुरक्षा सर्वोपरि होनी चाहिए।

लिव-इन और कानून की सीमाएं

भारत में लिव-इन रिलेशनशिप को पूरी तरह अवैध नहीं माना गया है, लेकिन इसके लिए कोई स्पष्ट और अलग कानून भी मौजूद नहीं है। ऐसे मामलों में अदालतें अक्सर परिस्थितियों के आधार पर फैसला देती हैं। मद्रास हाईकोर्ट की यह टिप्पणी इसी कानूनी खालीपन की ओर इशारा करती है, जहां महिला की सुरक्षा स्पष्ट कानून के अभाव में कमजोर पड़ सकती है।

महिलाओं की सुरक्षा पर जोर

कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि लिव-इन रिलेशनशिप में सबसे ज्यादा जोखिम महिलाओं को उठाना पड़ता है—चाहे वह सामाजिक असुरक्षा हो, आर्थिक निर्भरता या कानूनी संरक्षण की कमी। इसलिए अदालत का झुकाव इस बात की ओर है कि महिला को पति-पत्नी जैसे संबंधों में मिलने वाले अधिकारों के समान सुरक्षा मिलनी चाहिए।

समाज और कानून के लिए संदेश

मद्रास हाईकोर्ट की यह टिप्पणी सिर्फ एक केस तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज और कानून बनाने वालों के लिए भी एक संदेश है। कोर्ट ने अप्रत्यक्ष रूप से संकेत दिया कि बदलते सामाजिक रिश्तों के साथ कानूनों को भी विकसित होना चाहिए, ताकि किसी भी स्थिति में महिला असुरक्षित न रहे।