हर साल लगभग 2 लाख लोग भारतीय नागरिकता छोड़ रहे, प्रवासन के बढ़ते रुझान पर चिंता
नई दिल्ली, 13 दिसंबर 2025 । भारत से विदेशों की ओर बढ़ते प्रवासन को लेकर एक अहम तस्वीर सामने आ रही है। उपलब्ध आंकड़ों और सरकारी सूचनाओं के अनुसार, हर साल औसतन करीब 2 लाख लोग भारतीय नागरिकता छोड़ रहे हैं। यह रुझान बीते कुछ वर्षों से लगातार देखा जा रहा है और इससे सामाजिक, आर्थिक तथा नीतिगत स्तर पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। नागरिकता छोड़ने वालों में उच्च शिक्षित पेशेवर, कारोबारी और वैश्विक अवसरों की तलाश में निकले युवा बड़ी संख्या में शामिल हैं।
भारतीय नागरिकता छोड़ने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। विदेश मंत्रालय ने संसद को बताया है कि पिछले 5 सालों में करीब 9 लाख भारतीयों ने अपनी नागरिकता छोड़ दी है।
राज्यसभा में जवाब देते हुए विदेश राज्य मंत्री कीर्तिवर्धन सिंह कहा- 2011 से 2024 के बीच लगभग 21 लाख भारतीयों ने विदेशी नागरिकता अपनाई। 2021 के बाद नागरिकता छोड़ने वालों की संख्या में बड़ा उछाल देखने को मिला। जहां कोरोना महामारी के वर्ष 2020 में यह आंकड़ा घटकर 85 हजार के करीब रह गया था, वहीं इसके बाद यह संख्या 2 लाख के आसपास पहुंच गई।
3 साल में 5,945 भारतीय मिडिल-ईस्ट से लौटे
सरकार ने बताया कि पिछले 3 वर्षों में सुरक्षा कारणों से मिडिल ईस्ट के देशों से 5,945 भारतीय नागरिकों को निकाला गया। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने लोकसभा में बताया कि इनमें इजराइल से ‘ऑपरेशन अजय’ और ईरान-इजराइल से ‘ऑपरेशन सिंधु’ शामिल हैं। इसके अलावा कुवैत अग्निकांड में मारे गए 45 भारतीयों के शव भी भारत लाए गए।
विशेषज्ञों का मानना है कि बेहतर जीवन स्तर, कर प्रणाली, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं, साथ ही वैश्विक कार्य अवसर इस प्रवृत्ति के प्रमुख कारण हैं। कई लोग विदेशों में स्थायी निवास या नागरिकता प्राप्त करने के बाद भारतीय नागरिकता छोड़ने का विकल्प चुनते हैं, क्योंकि भारत में दोहरी नागरिकता की व्यवस्था नहीं है। इसके चलते भावनात्मक जुड़ाव के बावजूद कानूनी बाध्यता उन्हें यह कदम उठाने को मजबूर करती है।
आर्थिक दृष्टि से देखा जाए तो नागरिकता छोड़ने वाले लोगों में बड़ी संख्या उन व्यक्तियों की है जो उच्च आय वर्ग या उद्यमशील पृष्ठभूमि से आते हैं। इससे देश में ‘ब्रेन ड्रेन’ की बहस एक बार फिर तेज हो गई है। हालांकि, दूसरी ओर प्रवासी भारतीयों के जरिए विदेशी निवेश, रेमिटेंस और वैश्विक नेटवर्किंग का लाभ भी भारत को मिलता रहा है। सवाल यह है कि क्या नागरिकता त्यागने का बढ़ता आंकड़ा दीर्घकाल में देश की प्रतिभा और संसाधनों को प्रभावित करेगा।
नीति विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रवृत्ति को केवल नकारात्मक नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसके कारणों को समझकर सुधार की दिशा में कदम उठाने की जरूरत है। रोजगार के बेहतर अवसर, जीवन की गुणवत्ता, प्रशासनिक सुधार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के अनुरूप नीतियां इस चुनौती से निपटने में मदद कर सकती हैं। नागरिकता छोड़ने के बढ़ते आंकड़े यह संकेत देते हैं कि भारत को अपने मानव संसाधन को बनाए रखने के लिए दीर्घकालिक रणनीति पर काम करना होगा।


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