‘एक देश-एक चुनाव’ से मतदाता अधिकार प्रभावित नहीं होंगे: सरकार का तर्क, विपक्ष की शंकाएं
नई दिल्ली, 13 फ़रवरी 2026 । ‘एक देश-एक चुनाव’ यानी लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के प्रस्ताव पर बहस तेज है। सरकार का तर्क है कि इससे मतदाता अधिकारों पर कोई असर नहीं पड़ेगा, बल्कि चुनावी प्रक्रिया अधिक सुव्यवस्थित, किफायती और स्थिर बनेगी। वहीं विपक्ष का कहना है कि संघीय ढांचे और राज्यों की स्वायत्तता पर इसके दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व CJI जस्टिस बीआर गवई ने गुरुवार को वन नेशन, वन इलेक्शन (ONOE) पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि एक देश एक चुनाव से मतदाता अधिकार प्रभावित नहीं होंगे और संघीय ढांचे पर भी कोई असर नहीं पड़ेगा।
पूर्व CJI ने यह बात वन नेशन, वन इलेक्शन पर हुई जॉइंट पार्लियामेंट्री कमेटी (JPC) की एक मीटिंग कही।
उन्होंने तर्क दिया कि संसद के पास चुनावों को एक साथ करने के लिए ऐसा संशोधन लागू करने की शक्ति है, जैसा कि संविधान द्वारा अनिवार्य है।
एक देश एक चुनाव को लेकर JPC अंतिम निष्कर्ष के करीब है। कई मीडिया रिपोर्ट्स ने दावा किया है कि वन नेशन, वन इलेक्शन पर JPC की रिपोर्ट मार्च के अंत तक आ सकती है।
भारत में चुनाव कराने की संवैधानिक व्यवस्था Constitution of India के अनुच्छेद 83 और 172 के तहत लोकसभा और विधानसभाओं के कार्यकाल से जुड़ी है। वर्तमान प्रणाली में अलग-अलग समय पर चुनाव होने से मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट बार-बार लागू होता है, जिससे नीतिगत फैसलों और विकास परियोजनाओं पर प्रभाव पड़ता है। ‘एक देश-एक चुनाव’ के समर्थकों का कहना है कि यदि सभी चुनाव एक साथ हों, तो प्रशासनिक संसाधनों की बचत होगी और शासन अधिक निरंतरता के साथ काम कर सकेगा।
चुनाव आयोग की भूमिका भी इस प्रस्ताव में अहम है। Election Commission of India ने पहले संकेत दिया है कि तकनीकी और लॉजिस्टिक दृष्टि से यह संभव है, लेकिन इसके लिए व्यापक संवैधानिक संशोधन और राजनीतिक सहमति आवश्यक होगी। विशेषज्ञों का अनुमान है कि देश में लगभग 95 करोड़ से अधिक पंजीकृत मतदाता हैं; ऐसे में एक साथ चुनाव कराना विशाल प्रशासनिक अभ्यास होगा, जिसके लिए अतिरिक्त ईवीएम, वीवीपैट और सुरक्षा बलों की जरूरत पड़ेगी।
सरकार का दावा है कि मतदाता का मूल अधिकार—मत देना—किसी भी स्थिति में प्रभावित नहीं होगा। बल्कि एक ही समय पर मतदान से मतदान प्रतिशत बढ़ सकता है और मतदाता को बार-बार चुनावी प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ेगा। हालांकि आलोचकों का तर्क है कि यदि किसी सरकार का कार्यकाल बीच में समाप्त होता है, तो क्या पूरे देश को फिर से चुनाव में जाना होगा या वैकल्पिक व्यवस्था बनेगी—यह स्पष्ट होना जरूरी है।
संक्षेप में, ‘एक देश-एक चुनाव’ एक बड़ा संरचनात्मक सुधार माना जा रहा है। मतदाता अधिकारों के संदर्भ में सरकार का कहना है कि संवैधानिक सुरक्षा यथावत रहेगी, लेकिन इस प्रस्ताव की सफलता व्यापक राजनीतिक सहमति और स्पष्ट कानूनी ढांचे पर निर्भर करेगी।


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