ट्रम्प के ‘गाजा पीस बोर्ड’ में शामिल होने पर पाकिस्तानी पीएम शहबाज शरीफ घिरे, विपक्ष और जनता में भारी आलोचना

ट्रम्प के ‘गाजा पीस बोर्ड’ में शामिल होने पर पाकिस्तानी पीएम शहबाज शरीफ घिरे, विपक्ष और जनता में भारी आलोचना

इस्लामाबाद, 23 जनवरी 2026 ।  पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को डोनाल्ड ट्रंप द्वारा शुरू किए गए ‘Board of Peace’ (गाजा पीस बोर्ड) को समर्थन देने के फैसले के बाद अपने ही देश में तीखी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। इस बोर्ड का उद्देश्य अमेरिका की पहल के तहत गाजा संघर्ष को स्थायी शांति और समाप्ति की ओर ले जाना और वैश्विक संघर्षों के समाधान की दिशा में काम करना बताया जा रहा है। शहबाज शरीफ ने हाल ही में स्विट्ज़रलैंड के दावोस वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में इस बोर्ड के चार्टर पर हस्ताक्षर किए हैं, जिससे पाकिस्तान ने इसका औपचारिक हिस्सा बनने का कदम उठाया।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने गुरुवार को दावोस में अमेरिका के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ के चार्टर पर साइन किए हैं। इस बोर्ड को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की अगुवाई में गाजा में शांति कायम करने और फिर से बसाने के लिए बनाया गया है।

पाकिस्तानी मीडिया डॉन के मुताबिक ऐसा करके शहबाज शरीफ अपने ही घर में घिर गए हैं। पाकिस्तान में विपक्षी पार्टियों ने उनके फैसले का विरोध किया है और इसे पाकिस्तान के लिहाज से गलत बताया है। प्रसिद्ध पत्रकार और लेखक जाहिद हुसैन ने कहा कि पाकिस्तान ने जल्दबाजी में यह कदम उठाया है।

हुसैन ने कहा कि PM को दूसरों के फैसलों का इंतजार करना चाहिए था। उन्होंने इसे ट्रम्प की जोखिम भरी नीति का हिस्सा बताया और कहा कि यह बोर्ड यूनाइटेड नेशन (UN) के जैसा एक संगठन बन रहा है, जो वैश्विक व्यवस्था के लिए खतरा है। हुसैन ने कहा कि यह बस एक अमीरों का क्लब बन रहा है। शहबाज का यह कदम 2020 में ट्रंप के मध्य पूर्व शांति प्रस्ताव का कड़ा विरोध करने के उनके पहले के रुख से भी विपरीत बताया जा रहा है। उस समय उन्होंने ट्रंप की शांति योजना को “अन्यायपूर्ण और पक्षपाती” करार दिया था, लेकिन अब वही पहल का समर्थन कर रहे हैं, जिससे आलोचकों ने उनसे नीति में ‘यू-टर्न’ लेने का आरोप लगाया है। इस विवाद ने पाकिस्तान की विदेश नीति, आंतरिक राजनीतिक स्थिरता और उसके लोकतांत्रिक निर्णय-प्रक्रिया पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्षी दलों ने संसद में संपूर्ण परामर्श, पारदर्शिता और यहां तक कि जनमत (रेफरेंडम) की मांग करते हुए सरकार पर दबाव बढ़ा दिया है।