निशांत के बहाने ‘अंतिम बैटल’ की तैयारी? जदयू की रणनीति और चरणबद्ध एंट्री का सियासी गणित
पटना , 25 मार्च 2026 । बिहार की राजनीति में इन दिनों Nishant Kumar के नाम को लेकर चर्चाएं तेज हैं। माना जा रहा है कि Janata Dal (United) अब “निशांत फैक्टर” के जरिए अपने राजनीतिक भविष्य की निर्णायक लड़ाई लड़ने की तैयारी में है। यह सिर्फ एक नई एंट्री नहीं, बल्कि लंबे समय से तैयार की जा रही रणनीति का हिस्सा बताया जा रहा है।
जनता दल यू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार तो बन गए हैं, लेकिन उनकी उम्र और स्वास्थ को ले कर जदयू के रणनीतिकार हमेशा संशय में रह रहे हैं। जदयू के भीतरखाने की मानें तो नीतीश कुमार के बाद कौन? इस सवाल ने जदयू के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा कर दिया। राजनीतिक गलियारों में तो यह कहा भी जाने लगा कि नीतीश कुमार की अनुपस्थिति में जदयू के किसी भी वरीय नेता के प्रति सर्वमान्य समर्थन का माहौल नहीं है। यही वजह भी है कि जदयू के रणनीतिकारों ने निशांत कुमार को आगे कर जदयू को बचाने का अंतिम बैटल शुरू कर दिया है। यह बहुत ही साइंटिफिक तरीके से किया गया। जानते हैं कि कैसे-कैसे विभिन्न स्टेज में निशांत कुमार की लॉन्चिंग पर जदयू के रणनीतिकारों ने मोहर लगानी शुरू की।
सूत्रों के अनुसार, निशांत कुमार की राजनीति में एंट्री अचानक नहीं है। इसे चरणबद्ध तरीके से तैयार किया गया है, जिसमें पहले उनकी सार्वजनिक मौजूदगी बढ़ाई गई, फिर सामाजिक और संगठनात्मक गतिविधियों में भागीदारी दिखाई गई, और अब उन्हें राजनीतिक भूमिका में लाने का माहौल तैयार किया गया। इस पूरी प्रक्रिया को जदयू की “सॉफ्ट लॉन्चिंग” रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम Nitish Kumar के राजनीतिक उत्तराधिकार को लेकर भी अहम संकेत देता है। जदयू के सामने चुनौती सिर्फ चुनाव जीतने की नहीं, बल्कि पार्टी के भविष्य और नेतृत्व की निरंतरता बनाए रखने की भी है। ऐसे में निशांत को सामने लाना एक सोचा-समझा कदम माना जा रहा है।
विपक्षी दल इस पूरे घटनाक्रम को वंशवाद की राजनीति से जोड़कर देख रहे हैं और जदयू पर निशाना साध रहे हैं। उनका कहना है कि यह लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है और पार्टी अपने अस्तित्व को बचाने के लिए परिवारवाद का सहारा ले रही है। वहीं जदयू के नेता इसे पूरी तरह से संगठन का आंतरिक निर्णय बता रहे हैं और कह रहे हैं कि निशांत कुमार की भूमिका जनता और कार्यकर्ताओं की मांग के अनुसार तय की जाएगी।
इस घटनाक्रम को “अंतिम बैटल” के तौर पर इसलिए भी देखा जा रहा है क्योंकि बिहार की राजनीति में जदयू की स्थिति पिछले कुछ वर्षों में उतार-चढ़ाव भरी रही है। ऐसे में पार्टी अब एक मजबूत चेहरा और स्पष्ट दिशा के साथ आगे बढ़ने की कोशिश कर रही है।


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