सोनिया बोलीं – सरकार नेहरू को इतिहास से मिटाना चाहती है: राजनीतिक टकराव के बीच इतिहास की विरासत पर नई बहस
नई दिल्ली, 06 दिसंबर 2025 । भारत की राजनीति में इतिहास, विचारधारा और विरासत अक्सर टकराव के केंद्र में रहती हैं। इसी बहस को नए सिरे से हवा तब मिली जब पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने एक कार्यक्रम में यह टिप्पणी की कि मौजूदा सरकार स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री, पंडित जवाहरलाल नेहरू के योगदान को “इतिहास से मिटाने की कोशिश” कर रही है। उनके बयान ने केवल राजनीतिक गरमाहट ही नहीं बढ़ाई, बल्कि यह सवाल भी खड़ा किया कि भारत के निर्माताओं के योगदान को लेकर आखिर किस तरह की राजनीति हो रही है।
कांग्रेस पार्लियामेंट्री पार्टी (CPP) की चेयरपर्सन सोनिया गांधी शुक्रवार को दिल्ली स्थित जवाहर भवन में नेहरू सेंटर इंडिया के लॉन्च समारोह में शामिल हुईं। इस दौरान उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के खिलाफ बयानबाजी को लेकर भाजपा सरकार की आलोचना की।
सोनिया ने कहा- इसमें कोई शक नहीं है कि जवाहरलाल नेहरू को बदनाम करना आज की सत्ता का मुख्य मकसद है। वह उन्हें (नेहरू को) सिर्फ इतिहास से मिटाना नहीं चाहती, बल्कि उनकी सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक आधारों भी को कमजोर करना चाहती है, जिन पर देश खड़ा हुआ।
सोनिया ने कहा- इतने बड़े व्यक्तित्व (नेहरू) के जीवन और काम का एनालिसिस और समीक्षा होना स्वाभाविक है और ऐसा होना चाहिए भी। लेकिन उन्हें बदनाम करने, कमजोर दिखाने और उनकी बातें तोड़ने-मरोड़ने की संगठित कोशिश अस्वीकार्य है।
कांग्रेस नेता ने आगे कहा- नेहरू का व्यक्तित्व छोटा करने की कोशिश जारी है। उनका ऐतिहासिक बैकग्राउंड अलग रखकर उनके काम का आकलन करना अब आम होता जा रहा है। उनकी बहुमुखी विरासत खत्म करके दोबारा इतिहास लिखने की कोशिश हो रही है।
इस टिप्पणी के बाद सियासी हलकों में प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। समर्थकों ने सोनिया के तर्क का बचाव करते हुए कहा कि इतिहास किसी एक विचारधारा का नहीं होता, बल्कि राष्ट्र का साझा दस्तावेज होता है। वहीं सरकार समर्थित पक्ष ने इसे “पुरानी राजनीति का एक और उदाहरण” करार दिया और कहा कि इतिहास में सुधार का मतलब मिटाना नहीं बल्कि सही तथ्यों को सामने लाना है।
यह पूरा विवाद सिर्फ एक बयान का मसला नहीं है, बल्कि इस व्यापक विमर्श का हिस्सा है जिसमें यह पूछा जा रहा है कि क्या इतिहास को राजनीतिक दृष्टिकोण से देखना उचित है? क्या किसी नेता के योगदान को घटाना या बढ़ाना लोकतांत्रिक समाज के अनुरूप है? और क्या यह बहस इतिहास को बेहतर समझने में मदद करती है या समाज को और ज्यादा ध्रुवीकृत बनाती है?
सोनिया गांधी का यह बयान निश्चित रूप से राजनीतिक विमर्श को और तीखा बनाता है, लेकिन साथ ही यह भी याद दिलाता है कि भारत की आज़ादी, निर्माण और विकास की कहानी कई नेताओं और विचारधाराओं के संयुक्त प्रयास से बनी है। इस विरासत को समझना और संरक्षित रखना मौजूदा तथा आने वाली पीढ़ियों की ज़िम्मेदारी है।


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