सुप्रीम कोर्ट ने महाकाल मंदिर में ‘वीआईपी दर्शन’ के खिलाफ याचिका खारिज की—धार्मिक प्रबंधन में न्यायिक दखल असंगत
उज्जैन, 27 जनवरी 2026 । सुप्रीम कोर्ट ने उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में ‘वीआईपी दर्शन’ या गर्भगृह में विशिष्ट लोगों को प्राथमिकता देने की प्रथा के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि मंदिर प्रबंधन और धार्मिक मामलों में न्यायिक दखल करना उचित नहीं है और मंदिर प्रशासन तथा जिला प्रशासन के निर्णय को इस तरह के मामलों में प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
याचिका में यह तर्क दिया गया था कि गर्भगृह में प्रवेश में समान व्यवहार न होने और ‘वीआईपी’ वर्ग के भक्तों को विशेष अधिकार दिए जाने से संवैधानिक समानता के अधिकार (Article 14) और धार्मिक स्वतंत्रता (Article 25) का उल्लंघन हो रहा है। याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से यह मांग की थी कि सभी श्रद्धालुओं को बराबर प्रवेश और पूजा करने का अवसर सुनिश्चित किया जाए।
हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने पीठ में CJI सूर्यकांत, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमल्या बागची के समक्ष याचिका की सुनवाई के दौरान कहा कि यह मामला न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता और कोर्ट यह तय नहीं कर सकता कि गर्भगृह में कौन प्रवेश करे या न करे। अदालत ने कहा कि ऐसे धार्मिक निर्णय मंदिर प्रशासन और संबंधित अधिकारियों का अधिकार है, न कि न्यायालय का।
अदालत ने याचिकाकर्ता को सुझाव दिया कि वह संबंधित प्रशासनिक अथॉरिटी के समक्ष अपनी बातें रखे और प्रबंधन से समाधान मांगे, क्योंकि धार्मिक अनुशासनों और पूजा प्रक्रियाओं के भीतर समानता या भेदभाव जैसे मामलों में कोर्ट का हस्तक्षेप सीमित है।
यह फैसला यह स्पष्ट करता है कि भारत में धार्मिक स्थलों के प्रबंधन और दर्शन प्रक्रियाओं के मामलों में न्यायालय आमतौर पर निर्णय प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं करता, जब तक कि कोई अत्यधिक संवैधानिक उल्लंघन सिद्ध न हो।


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