Supreme Court of India की टिप्पणी: “RERA को बंद कर देना ही बेहतर” — सख्त रुख से रियल एस्टेट नियमन पर बहस तेज

Supreme Court of India की टिप्पणी: “RERA को बंद कर देना ही बेहतर” — सख्त रुख से रियल एस्टेट नियमन पर बहस तेज

नई दिल्ली, 13 फ़रवरी 2026 । Supreme Court of India ने सुनवाई के दौरान रियल एस्टेट नियामक व्यवस्था को लेकर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि नियमों का पालन प्रभावी ढंग से नहीं हो रहा, तो “RERA को बंद कर देना ही बेहतर” जैसी स्थिति बनती दिखती है। अदालत की यह टिप्पणी नियामक तंत्र की कार्यक्षमता, राज्य स्तर पर अनुपालन और होमबायर्स को समयबद्ध राहत मिलने पर उठते सवालों के बीच आई है।

सुप्रीम कोर्ट ने रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (RERA) के कामकाज पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसे बंद कर देना ही बेहतर है। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के एक फैसले के खिलाफ सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्य बागची की बेंच ने ये बात कही।

कोर्ट ने कहा कि अब समय आ गया है कि राज्य सरकारें रेरा के गठन पर दोबारा विचार करें। यह संस्था खरीदारों की मदद के बजाय केवल डिफॉल्टर बिल्डरों को फायदा पहुंचा रही है। कोर्ट ने कहा कि जिस उद्देश्य के लिए रेरा बनाया गया था, वह पूरी तरह भटक गया है।

RERA यानी Real Estate (Regulation and Development) Act, 2016 का उद्देश्य रियल एस्टेट सेक्टर में पारदर्शिता लाना, परियोजनाओं का समय पर पूरा होना सुनिश्चित करना और खरीदारों के हितों की रक्षा करना था। कानून के तहत प्रत्येक राज्य में रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी का गठन, परियोजनाओं का पंजीकरण और बिल्डर्स पर सख्त खुलासे (disclosures) की बाध्यता अनिवार्य है। परंतु कई मामलों में आदेशों के अनुपालन में देरी, अपीलों की लंबी प्रक्रिया और प्रवर्तन की कमजोरी पर अदालत ने असंतोष जताया।

अदालत की टिप्पणी का सार यह है कि कानून कागज़ पर मजबूत हो सकता है, लेकिन यदि आदेशों का पालन नहीं होता, तो पीड़ित खरीदारों को वास्तविक राहत नहीं मिलती। न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि राज्यों को अपने-अपने RERA प्राधिकरणों की जवाबदेही तय करनी चाहिए, ताकि परियोजनाओं में देरी, फंड डायवर्जन और भ्रामक विज्ञापन जैसी समस्याओं पर प्रभावी अंकुश लगे।

इस सख्त रुख के बाद रियल एस्टेट सेक्टर में सुधारों की मांग तेज हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि RERA को बंद करने के बजाय उसके प्रवर्तन तंत्र को मजबूत करना, डिजिटल मॉनिटरिंग बढ़ाना, और आदेशों के अनुपालन के लिए समय-सीमा आधारित दंडात्मक प्रावधान लागू करना अधिक व्यावहारिक समाधान होगा। यदि नियामक संस्थाएं सक्रिय और पारदर्शी बनें, तो कानून का मूल उद्देश्य—खरीदारों का विश्वास बहाल करना—पूरी तरह हासिल किया जा सकता है।