सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: “मैसूर दशहरा सरकारी आयोजन है, तो फिर लोगों में फर्क क्यों?”

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: “मैसूर दशहरा सरकारी आयोजन है, तो फिर लोगों में फर्क क्यों?”

कर्नाटक , 19 सितम्बर 2025 : सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मैसूर चामुंडी मंदिर में दशहरा उत्सव के उद्घाटन में बुकर पुरस्कार विजेता बानू मुश्ताक को आमंत्रित करने के कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिक खारिज कर दी।

याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट पीबी सुरेश ने दलील दी कि किसी गैर-हिंदू व्यक्ति को पूजा करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। इसके बाद जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने उनके इस तर्क पर कहा- खारिज।

एडवोकेट सुरेश ने दलील दी कि मंदिर के अंदर पूजा को धर्मनिरपेक्ष कार्य नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा- यह पूरी तरह से राजनीतिक है। कोई कारण नहीं है कि उन्हें धार्मिक उत्सव के लिए मंदिर के अंदर लाया जाए। जस्टिस नाथ ने फिर दोहराया- खारिज।

सीनियर एडवोकेट ने बिना फिर आरोप लगाया कि आमंत्रित अतिथि मुश्ताक ने धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली कुछ आपत्तिजनक टिप्पणियां की थीं, इसलिए ऐसे व्यक्ति को आमंत्रित नहीं किया जा सकता।

बानू मुश्ताक सामाजिक कार्यकर्ता, कई आंदोलन से जुड़ीं

62 साल की बानू मुश्ताक कन्नड़ लेखिका, सामाजिक कार्यकर्ता और किसान आंदोलनों और कन्नड़ भाषा आंदोलनों से जुड़ी रही हैं। मई 2025 में उन्होंने अपनी कहानी संग्रह एडेया हनाटे (Heart Lamp) के लिए International Booker Prize जीता है। इस किताब का अंग्रेजी अनुवाद दीपा भस्थ ने किया था। राज्य की सिद्धारमैया सरकार ने उनके साहित्यिक और सामाजिक योगदान को देखते हुए इस बार दशहरा का उद्घाटन करने के लिए आमंत्रित किया है।

मामला क्या है?

हाल ही में दायर एक याचिका में आरोप लगाया गया था कि मैसूर दशहरा समारोह में कुछ वर्गों और समूहों को प्राथमिकता दी जाती है जबकि अन्य समुदायों की उपेक्षा होती है। याचिकाकर्ता का कहना था कि दशहरा, जिसे कर्नाटक की “नाड हब्बा” (राज्य महोत्सव) माना जाता है, उसमें सभी को बराबर की भागीदारी मिलनी चाहिए।