सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी—आखिर कुत्तों के कारण लोग कब तक परेशानी झेलेंगे?

सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी—आखिर कुत्तों के कारण लोग कब तक परेशानी झेलेंगे?

नई दिल्ली, 07 जनवरी 2026 ।  देश में आवारा कुत्तों से जुड़ी बढ़ती समस्याओं पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए बड़ा सवाल खड़ा किया है। कोर्ट ने कहा कि आम नागरिक आखिर कब तक कुत्तों के कारण डर और परेशानी में जीने को मजबूर रहेंगे। यह टिप्पणी उन याचिकाओं की सुनवाई के दौरान आई, जिनमें आवारा कुत्तों के हमलों, बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा तथा शहरी इलाकों में बढ़ते खतरे का मुद्दा उठाया गया था।

सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को आवारा कुत्तों से जुड़े मामले पर सुनवाई हुई। बहस में कुत्तों के मूड, कुत्तों की काउंसलिंग, कम्युनिटी डॉग्स और इंस्टीट्यूशनलाइज्ड डॉग्स जैसे शब्द सामने आए।

कोर्ट ने कहा कि मामला सिर्फ कुत्ते के काटने का नहीं है। वो जब सड़क पर दौड़ते हैं या किसी का पीछा करते हैं उससे एक्सीडेंट का खतरा रहता है। इसलिए रोकथाम इलाज से बेहतर है।

इसको लेकर बहस में आवारा कुत्तों के फेवर में पैरवी कर रहे कपिल सिब्बल ने कहा कि लोग सेंटर पर फोन कर सकते हैं ताकि उन्हें पकड़कर नसबंदी की जा सके।

फिर कोर्ट ने कहा, अब तो बस एक ही चीज बाकी है, कुत्तों को भी काउंसलिंग देना। ताकि वापस छोड़े जाने पर वह काटे नहीं।

कोर्ट ने आगे सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि कुत्तों के कारण आम लोगों को आखिर कब तक परेशानी झेलनी पड़ेगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि उसका आदेश सड़कों के लिए नहीं, बल्कि केवल संस्थागत क्षेत्रों के लिए है।

पीठ ने सवाल उठाया कि स्कूलों, अस्पतालों और अदालत परिसरों के भीतर आवारा कुत्तों की क्या आवश्यकता है और उन्हें वहां से हटाने पर क्या आपत्ति हो सकती है।

सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि कई शहरों में डॉग बाइट के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, जिससे न सिर्फ शारीरिक नुकसान हो रहा है, बल्कि मानसिक डर का माहौल भी बन रहा है। कोर्ट ने कहा कि पशु प्रेम और मानवीय संवेदना जरूरी है, लेकिन अराजक स्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता

विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी सरकार और स्थानीय निकायों के लिए चेतावनी है। अब जरूरत है संतुलित नीति की—जिसमें पशु कल्याण के साथ-साथ आम जनता की सुरक्षा सुनिश्चित हो। कोर्ट की सख्त भाषा यह संकेत देती है कि आने वाले समय में इस मुद्दे पर बड़े और व्यावहारिक फैसले देखने को मिल सकते हैं।

कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट का यह सवाल सिर्फ एक टिप्पणी नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक समस्या की ओर ध्यान दिलाने वाला संदेश है—जिसका समाधान टालने से हालात और बिगड़ सकते हैं।