2009 में हुआ एसिड अटैक—16 साल से न्याय का इंतज़ार, केस अब भी पेंडिंग
नई दिल्ली, 05 दिसंबर 2025 । देश में एसिड अटैक को लेकर कड़े कानून बनने के बावजूद, कई पीड़ित आज भी न्याय के लिए वर्षों से अदालतों के चक्कर काट रहे हैं। ऐसा ही एक मामला 2009 का है, जिसमें एक महिला पर दर्दनाक एसिड अटैक हुआ था।
हमले को 16 साल बीत चुके हैं, लेकिन केस आज भी पेंडिंग है। पीड़िता की तकलीफ़, लंबी कानूनी प्रक्रिया और सिस्टम की सुस्ती ने न्याय की उम्मीद को बेहद कठिन बना दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एसिड अटैक के मामलों की सुनवाई सालों तक अदालत में पेंडिंग रहने पर हैरानी जताई। दिल्ली की रोहिणी कोर्ट में 2009 के केस में 16 साल बाद अब तक ट्रायल चलने को कोर्ट ने राष्ट्रीय शर्म बताया।
सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के सभी हाईकोर्ट को ऐसे पेंडिंग मामलों का ब्योरा 4 हफ्ते में जमा करने के निर्देश दिए। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने इन मामलों के शीघ्र निपटारे के लिए स्पेशल कोर्ट बनाने पर चर्चा की।
कोर्ट ने केंद्र से कहा कि संसद या अध्यादेश के जरिए कानून संशोधन करें, ताकि जिंदा बची पीड़िताएं दिव्यांग की परिभाषा में जुड़कर कल्याणकारी योजनाओं का फायदा उठा सकें।
बेंच ने एसिड अटैक सर्वाइवर शाहीना मलिक की जनहित याचिका पर केंद्र और दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग को भी नोटिस जारी किए। याचिका में मांग की गई है कि पीड़िताओं को दिव्यांग के रूप में वर्गीकृत किया जाए।
देशभर में 844 एसिड अटैक केस लंबित हैं
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के मुताबिक विभिन्न अदालतों में एसिड अटैक से जुड़े 844 केस लंबित हैं। 2025 में जारी रिपोर्ट में ये आंकड़े वर्ष 2023 तक के हैं। एनसीआरबी के मुताबिक देश में 2021 के बाद से एसिड अटैक के मामले लगातार बढ़े हैं।
मर्यादा भंग नहीं तो महिला के फोटो खींचना अपराध नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य मामले में कहा कि महिला अगर निजी पलों में नहीं है तो उसकी सहमति के बिना फोटो लेना या मोबाइल से वीडियो बनाना आईपीसी की धारा 354सी के तहत अपराध नहीं है। जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर लगाते हुए एक आरोपी को बरी कर दिया।
आगे की राह
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केस को फास्ट-ट्रैक कोर्ट में शिफ्ट करने की मांग उठ सकती है।
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पीड़िता को राज्य की ओर से कानूनी और आर्थिक सहायता दिए जाने की जरूरत है।
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ऐसे मामलों में सख्त समयसीमा लागू करना जरूरी है।
यह सिर्फ एक पीड़िता की कहानी नहीं, बल्कि देश की न्याय व्यवस्था के सामने खड़ी एक चुनौती है—क्या हम ऐसे पीड़ितों को समय पर न्याय दे पा रहे हैं?


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