“बिहार में ‘भगवा’ राज की आहट? क्या भाजपा का भावी CM चलेगा ‘सुशासन’ की राह पर”
पटना , 21 मार्च 2026 । बिहार की राजनीति में एक बार फिर बड़ा सवाल उभर रहा है—क्या राज्य में ‘भगवा’ राज की तैयारी हो रही है, और अगर ऐसा होता है तो क्या अगला मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के ‘सुशासन’ मॉडल पर ही आगे बढ़ेगा?
बिहार की सियासत में केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी ने बीजेपी के उस मंसूबे पर प्रश्न चिह्न खड़ा कर दिया जहां बीजेपी अपने मुख्यमंत्री के जरिए बिहार की सत्ता की बागडोर थामने की तैयारी कर रही हैं। समृद्धि यात्रा के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी ने अपरोक्ष रूप से बीजेपी के सामने चुनौती खड़ा कर दिया बल्कि उनकी सत्ता को नीतीश कुमार की लाइन पर चलने को सीमित कर दिया। पहले जानते है कि जीतनराम मांझी ने ऐसा क्या कहा कि बीजेपी भी हतप्रभ है।
पिछले कई वर्षों में नीतीश कुमार ने ‘सुशासन बाबू’ की छवि के साथ कानून-व्यवस्था, सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सुधार की राजनीति को केंद्र में रखा। उनकी इस कार्यशैली ने बिहार की राजनीति में एक अलग पहचान बनाई है, जिसे अब भी एक प्रभावी प्रशासनिक मॉडल के रूप में देखा जाता है।
वहीं, भारतीय जनता पार्टी राज्य में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए लगातार रणनीति बना रही है। भाजपा के भीतर संभावित मुख्यमंत्री चेहरों को लेकर चर्चा तेज है, लेकिन पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह जनता के बीच भरोसे को बनाए रखने के लिए किस तरह का प्रशासनिक मॉडल पेश करती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा अगर सत्ता में आती है, तो पूरी तरह नई राह अपनाने के बजाय ‘सुशासन’ के स्थापित मॉडल को ही आगे बढ़ाने की कोशिश कर सकती है। कारण साफ है—बिहार की जनता अब विकास, स्थिरता और बेहतर कानून-व्यवस्था की अपेक्षा करती है, जिसे नजरअंदाज करना किसी भी पार्टी के लिए जोखिम भरा हो सकता है।
दूसरी ओर, विपक्ष भी इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है और भाजपा के संभावित कदमों को लेकर सवाल उठा रहा है। ऐसे में आने वाले चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि प्रशासनिक दृष्टिकोण और विकास मॉडल के चयन का भी बड़ा मुकाबला साबित हो सकते हैं।
कुल मिलाकर, बिहार की राजनीति एक दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है, जहां ‘भगवा’ राजनीति और ‘सुशासन’ मॉडल के बीच संतुलन ही भविष्य की दिशा तय करेगा।


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