“CJI बोले — अधिकारों की रक्षा के लिए अदालतों की सक्रियता जरूरी, लेकिन ‘judicial terrorism’ नहीं”

“CJI बोले — अधिकारों की रक्षा के लिए अदालतों की सक्रियता जरूरी, लेकिन ‘judicial terrorism’ नहीं”

नई दिल्ली । 28 जून 25 । भारत के मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई ने शुक्रवार को कहा कि संविधान और नागरिकों के अधिकारों को बनाए रखने के लिए न्यायिक सक्रियता जरूरी है। यह बनी रहेगी, लेकिन इसे न्यायिक आतंकवाद में नहीं बदला जा सकता।

CJI ने कहा कि भारतीय लोकतंत्र के तीनों अंगों विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका को उनकी सीमाएं दी गई हैं। तीनों को कानून के अनुसार काम करना होगा। जब संसद कानून या नियम से परे जाती है, तो न्यायपालिका हस्तक्षेप कर सकती है।

CJI गवई नागपुर जिला कोर्ट बार एसोसिएशन के कार्यक्रम में बोल रहे थे। यहां उन्होंने कुछ किस्से साझा किए। अपने माता-पिता के संघर्षों के बारे में बताया। अपने जीवन पर माता-पिता के प्रभाव के बारे में बात करते हुए भावुक हो गए।

CJI बोले- पिता भी बनना चाहते थे वकील

CJI ने कहा, "मैं आर्किटेक्ट बनना चाहता था, लेकिन मेरे पिता ने मेरे लिए अलग सपने देखे थे। वह हमेशा चाहते थे कि मैं वकील बनूं, एक ऐसा सपना जो वह खुद पूरा नहीं कर सके। मेरे पिता ने खुद को अंबेडकर की सेवा में समर्पित कर दिया। वह खुद एक वकील बनना चाहते थे, लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा होने के कारण उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया, इसलिए वह अपनी इच्छा पूरी नहीं कर सके।"

जस्टिस गवई ने बताया कि वे संयुक्त परिवार में रहते थे, जिसमें कई बच्चे थे और सारी जिम्मेदारी उनकी मां और चाची पर थी। इसलिए अपने पिता की इच्छा पूरी करने के लिए उन्होंने आर्किटेक्ट बनने के अपने सपने को छोड़ दिया।

जानिए क्या न्यायिक सक्रियता और न्यायिक आतंकवाद

  • न्यायिक सक्रियता या ज्यूडिशियल एक्टिविज्म : न्यायिक सक्रियता का मतलब होता है, जब अदालतें खास तौर पर हाईकोर्ट या सु्प्रीम कोर्ट अपने पारंपरिक दायरे से आगे बढ़कर ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करती हैं जहां कार्यपालिका यानी सरकार और विधायिका यानी संसद/विधानसभा निष्क्रिय या विफल रही हो। यानी जब अदालतें खुद पहल करके किसी मुद्दे पर फैसला देती हैं, या सरकार को दिशा-निर्देश देती हैं, जिससे आम जनता के अधिकारों की रक्षा हो उसे ज्यूडिशियल एक्टिविज्म कहते हैं।
  • न्यायिक आतंकवाद या ज्यूडिशियल टेररिज्म : यह कोई कानूनी शब्द नहीं है, और इसका इस्तेमाल करना न्यायपालिका का अपमान माना जाता है। जब कोई पक्ष मानता है कि अदालत निष्पक्ष नहीं है। या अदालत बार-बार ऐसे आदेश देती हो जो किसी खास राजनीतिक विचारधारा या समूह के खिलाफ लगते हैं। जब अदालत या न्यायिक संस्थान अपने निर्णयों या दखल से किसी पक्ष को ऐसा महसूस कराए कि उन्हें डराया, धमकाया या दबाया जा रहा है, तो कुछ लोग आलोचना में इस स्थिति को ज्यूडिशियल टेररिज्म कहा जाता है।