“दिल्ली हाईकोर्ट ने पतंजलि को डाबर च्यवनप्राश को बदनाम करने वाले विज्ञापन चलाने से रोका”

“दिल्ली हाईकोर्ट ने पतंजलि को डाबर च्यवनप्राश को बदनाम करने वाले विज्ञापन चलाने से रोका”

नई दिल्ली। 03 जुलाई 25 । दिल्ली हाईकोर्ट ने गुरुवार को पतंजलि को निर्देश दिया है कि वह डाबर च्यवनप्राश के खिलाफ कोई भी नकारात्मक या भ्रामक विज्ञापन न दिखाए। यह आदेश न्यायमूर्ति मीनी पुष्कर्णा ने डाबर की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के बाद दिया।

डाबर ने कोर्ट में तर्क रखा कि इस तरह के विज्ञापन न सिर्फ उनके उत्पाद को बदनाम करते हैं, बल्कि उपभोक्ताओं को गुमराह भी करते हैं। उन्होंने कहा कि च्यवनप्राश एक पारंपरिक आयुर्वेदिक औषधि है, जिसे ड्रग्स और कॉस्मेटिक एक्ट के तहत नियमानुसार ही बनाना होता है। ऐसे में अन्य ब्रांड्स को सामान्य कहना गलत, भ्रामक और नुकसानदायक है।

अब इस मामले की अगली सुनवाई 14 जुलाई को होगी। फिलहाल पतंजलि च्यवनप्राश के विज्ञापन पर रोक लगा दी गई है। केस में डाबर की तरफ से वरिष्ठ वकील संदीप सेठी ने वकालत की, जबकि पतंजलि की ओर से वरिष्ठ वकील राजीव नायर और जयंत मेहता पेश हुए थे।

डाबर का आरोप- पतंजलि उनके प्रोडक्ट की इमेज खराब कर रहा

डाबर ने आरोप लगाया था कि पतंजलि अपने विज्ञापन में उनके च्यवनप्राश उत्पाद को "सामान्य" और आयुर्वेद की परंपरा से दूर बताकर प्रोडक्ट की इमेज खराब कर रहा है। इस विज्ञापन में स्वामी रामदेव खुद यह कहते नजर आते हैं कि "जिन्हें आयुर्वेद और वेदों का ज्ञान नहीं, वे पारंपरिक च्यवनप्राश कैसे बना सकते हैं?"

इसके अलावा डाबर ने कहा कि विज्ञापन में 40 औषधियों वाले च्यवनप्राश को साधारण कहा गया है, जो डाबर के उत्पाद पर सीधा निशाना माना गया क्योंकि डाबर अपने च्यवनप्राश को "40+ जड़ी-बूटियों से बना" बताता है और इस बाजार में 60% से ज्यादा हिस्सेदारी रखता है।