“भारत अमेरिका जैसे ‘बंकर-बस्टर’ मिसाइल बना रहा है — Agni‑5 आधारित हथियार 80‑100 मीटर अंदर तक पैठ सकेगा”
नई दिल्ली । 01 जुलाई 25। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) इंटर कॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल अग्नि-5 (Agni-5) के 2 नए वर्जन तैयार कर रहा है। ये 7500 किलोग्राम के बंकर बस्टर वॉरहेड ले जाने और जमीन में 100 मीटर की गहराई तक जाकर दुश्मनों के न्यूक्लियर सिस्टम, रडार सिस्टम, कंट्रोल सेंटर, हथियार स्टोरेज को तबाह कर सकेगी।
यह पहल ऐसे समय पर सामने आई है, जब अमेरिका ने हाल ही में ईरान के फोर्दो परमाणु संयंत्र पर 21 जून को 14 GBU-57/ए बमों का इस्तेमाल किया था। फोर्दो परमाणु संयंत्र 200 फीट नीचे है। GBU-57 का वॉरहेड 2600 किलो का है।
नए वर्जन में क्या नया होगा
अग्नि-5 के पुराने वर्जन की क्षमता 5 हजार किलोमीटर की दूरी तक न्यूक्लियर हथियार ले जाने की है। इसके दो नए वर्जन (बस्टर मिसाइल) की रेंज 2500 किमी होगी।
यह मैक 8 से मैक 20 की हाइपरसोनिक गति से वार कर सकेगी। यानि आवाज से 8 से 20 गुना तेज हमला करेगी।
7500 किलोग्राम के बंकर बस्टर वॉरहेड (विस्फोटक) ले जाने की क्षमता होगी। यानी अमेरिकी GBU-57 बंकर बस्टर बम से ज्यादा है। DRDO की ये उपलब्धि भारत को अमेरिका के 30 हजार पाउंड (13600 किलो) वजनी GBU-57 सीरीज के 'बंकर बस्टर' बम के बराबर ला देगी।
भारत के लिए क्यों जरूरी?
ऑपरेशन सिंदूर के बाद से भारत दुश्मनों के बंकर तोड़ने वाली मिसाइलों को तेजी से बढ़ा रहा है। भारत-पाकिस्तान तनाव, ईरान-इजराइल युद्ध को देखते हुए भारत अपने डिफेंस सिस्टम और मजबूत कर रहा है।
पाकिस्तान और चीन ने अपनी सीमाओं पर मजबूत जमीन के नीचे ठिकाने बनाए हैं। पहाड़ी क्षेत्रों, ऊंचाई वाली इलाकों में ये मिसाइल बड़ा रोल निभाएगी। सीमा के पास दुश्मन के कमांड सेंटर और हथियार गोदामों को नष्ट करेगी।
अमेरिका का GBU-57 बंकर बम- दुनिया का सबसे शक्तिशाली हथियार
अमेरिका ने 21 जून को ईरान की फोर्डो परमाणु साइट पर हमला किया था। इस हमले में अमेरिका ने पहली बार 30,000 पाउंड वजनी GBU-57 सीरीज के 'बंकर बस्टर' बमों का इस्तेमाल किया था। ये बम खास तौर पर गहरे बंकरों और जमीन के नीचे बनी साइट्स को नष्ट करने के लिए बनाए गए हैं।
अमेरिकी सेना के चेयरमैन लेफ्टिनेंट जनरल डैन केन ने बताया था कि इन बमों को बनाने में 15 साल लगे। 2009 में जब अमेरिका को ईरान की फोर्डो साइट के बारे में पता चला, तब उनके पास इसे तबाह करने के लिए कोई सही हथियार नहीं था। इसके बाद अमेरिका ने इन शक्तिशाली बमों को डेवलप किया।


RashtriyaPravakta