यूपी की राजनीति में नया जातीय समीकरण, PDA के मुकाबले बीजेपी का ‘5 पांडव’ दांव
लखनऊ, 29 मई 2026 । उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी के PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फार्मूले के जवाब में भारतीय जनता पार्टी ने नई सामाजिक और राजनीतिक रणनीति पर काम तेज कर दिया है। बीजेपी अब ‘5 पांडव’ मॉडल के जरिए विभिन्न जातीय और सामाजिक वर्गों को साधने की कोशिश में जुटी दिखाई दे रही है। राजनीतिक गलियारों में इसे भाजपा का बड़ा मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है।
उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी ने राज्य के पांच जिलों में पार्टी के अध्यक्षों की नियुक्ति की है। अवध क्षेत्र के अंबेडकर नगर में दिलीप देव पटेल, काशी क्षेत्र के वाराणसी में राम सकल पटेल, चंदौली में काशीनाथ सिंह, गोरखपुर में रमेश प्रसाद गुप्ता और देवरिया में काली प्रसाद को अध्यक्ष बनाया गया है।
बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष और केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री पंकज चौधरी ने गुरुवार को पार्टी के पांच नए जिलाध्यक्षों की घोषणा की। यह पांच जिले वाराणसी, गोरखपुर, अंबेडकरनगर, देवरिया और चंदौली हैं। बीजेपी ने इन पांचों जिलों में स्थानीय डेमोग्राफी और जातिगत समीकरणों का ध्यान रखा है। उसने दो जिलों में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और अन्य तीन जिलों में दलित, वैश्य और क्षत्रिय को जिलाध्यक्ष बनाया है।
जनीतिक चर्चाओं के मुताबिक बीजेपी ने पटेल, गुप्ता, ठाकुर समेत कई प्रभावशाली सामाजिक वर्गों के नेताओं को आगे कर एक संतुलित सामाजिक संदेश देने की रणनीति तैयार की है। पार्टी का उद्देश्य गैर-यादव पिछड़े वर्ग, सवर्ण मतदाताओं और शहरी वोट बैंक को मजबूत बनाए रखना है।
विश्लेषकों का मानना है कि समाजवादी पार्टी जहां PDA के जरिए सामाजिक न्याय और बहुजन समीकरण को मजबूत करने की कोशिश कर रही है, वहीं बीजेपी जवाबी रणनीति के तहत अलग-अलग समुदायों में प्रभाव रखने वाले चेहरों को सामने लाकर व्यापक समर्थन जुटाने में लगी है।
भाजपा नेताओं का दावा है कि पार्टी केवल जातीय राजनीति नहीं बल्कि विकास, कानून व्यवस्था और राष्ट्रवाद के मुद्दों पर चुनाव लड़ती है। हालांकि विपक्ष इसे सामाजिक समीकरणों की राजनीति करार दे रहा है और कह रहा है कि भाजपा PDA की बढ़ती लोकप्रियता से घबराई हुई है।
उत्तर प्रदेश में आगामी चुनावों को देखते हुए दोनों दलों के बीच राजनीतिक रणनीतियों की लड़ाई और तेज होती नजर आ रही है। सपा अपने PDA अभियान को लगातार धार दे रही है, जबकि बीजेपी अपने नए सामाजिक समीकरणों के जरिए चुनावी बढ़त बनाए रखने की कोशिश में जुटी है।


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