सुपरस्टार बनने के बाद भी अमिताभ बच्चन रहे विनम्र — महानायक की सादगी ही उनकी सबसे बड़ी पहचान
नई दिल्ली, 11 अक्टूबर 2025 । भारतीय सिनेमा के महानायक अमिताभ बच्चन न केवल अपनी अदाकारी के लिए जाने जाते हैं, बल्कि अपने व्यवहार और विनम्रता के लिए भी देश-विदेश में सम्मानित हैं। सफलता की ऊंचाइयों को छूने के बावजूद उन्होंने हमेशा सादगी, अनुशासन और आदर का जीवन जिया। यही कारण है कि दशकों बाद भी वे दर्शकों के दिलों में एक विशेष स्थान बनाए हुए हैं।
बॉलीवुड के इतिहास में कुछ साझेदारियां ऐसी होती हैं, जो सिर्फ फिल्मों को ही नहीं, बल्कि एक पूरे युग को परिभाषित कर देती हैं। ऐसी ही एक अद्वितीय जोड़ी रही सलीम-जावेद की, जिनकी लेखनी ने हिंदी सिनेमा को 'एंग्री यंग मैन' जैसा अमर किरदार दिया। यह किरदार किसी और ने नहीं, बल्कि अमिताभ बच्चन ने पर्दे पर जिया और उन्हें भारतीय सिनेमा का 'महानायक' कहा गया।
हाल ही में दैनिक भास्कर के साथ बातचीत में लेखक जावेद अख्तर उस समय के बार में बताया जब अमिताभ बच्चन को कोई 'चढ़ता सूरज' नहीं मानता था।
कामयाबी से पहले की कामयाबी
आमतौर पर फिल्म इंडस्ट्री में यह धारणा रही है कि लोग 'चढ़ते सूरज' को ही सलाम करते हैं, यानी सिर्फ सफल अभिनेताओं पर ही दांव लगाते हैं, लेकिन जावेद अख्तर का नजरिया अलग और दूरदर्शी रहा। बकौल जावेद अख्तर, “सूरज में रोशनी देखनी चाहिए, न कि उसके उगने या डूबने के समय पर ध्यान देना चाहिए और यह रोशनी मैंने अमिताभ बच्चन में तब देख ली थी, जब उनकी कई फिल्में, जैसे 'रास्ते का पत्थर' और 'बंसी बिरजू', बॉक्स ऑफिस पर नाकाम साबित हो रही थीं। इसके बावजूद मुझे अमिताभ बच्चन की काबिलियत पर पूरा यकीन था।
फिल्में भले असफल थीं, मगर एक्टर कतई असफल नहीं थे। मैं यह देख सकता था कि फिल्में नाकाम हैं, पर अमिताभ अपना काम बेहद अच्छा कर रहे हैं। अगर स्क्रिप्ट खराब थी या कहानी में गड़बड़ थी, तो इसका इल्जाम उस अभिनेता पर नहीं लगाया जा सकता। जो काम उसे दिया गया, वह कमाल का कर रहा है।
उनका यह विश्वास सिर्फ सामान्य प्रशंसा पर आधारित नहीं था, बल्कि यह एक लेखक और दर्शक की पैनी समझ थी। जावेद अख्तर के मुताबिक, “चाहे कॉमेडी हो, गंभीर रोल हो, गुस्सा हो या मुस्कान, अमिताभ बच्चन हर भाव को पर्दे पर परफेक्ट तरीके से उतार रहे थे। यह एक नायाब अभिनेता हैं, जिन्हें बस सही स्क्रिप्ट और निर्देशन की जरूरत थी, जिसके बिना फिल्में फ्लॉप हो रही थीं।”
'जंजीर' में रिस्क और दृढ़ विश्वास की जीत
अमिताभ बच्चन के करियर का टर्निंग पॉइंट फिल्म 'जंजीर' (1973) थी। यह फिल्म न सिर्फ उन्हें 'एंग्री यंग मैन' का तमगा दिलाने में सफल रही, बल्कि सलीम-जावेद को भी बॉलीवुड के सबसे बड़े राइटर्स के तौर पर स्थापित किया। मगर इस फिल्म की कास्टिंग भी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं थी।
जावेद अख्तर बताते हैं, “जंजीर की स्क्रिप्ट कई बड़े अभिनेताओं के पास गई थी, लेकिन सभी ने उसे रिजेक्ट कर दिया। प्रकाश मेहरा साहब (निर्देशक/निर्माता) के पास दो ही विकल्प थे: या तो स्क्रिप्ट छोड़ दें, या उस समय मौजूद ऐसे अभिनेता को लें जिसकी पिछली फिल्में असफल रही थीं। यहीं पर प्रकाश मेहरा साहब के कनविक्शन की जीत हुई। उन्होंने फ्लॉप अभिनेता पर दांव लगाया, मगर अपनी बेहतरीन स्क्रिप्ट नहीं छोड़ी।”
जावेद अख्तर इस बात के लिए प्रकाश मेहरा को सलाम करते हैं, क्योंकि उस वक्त सलीम-जावेद का नाम इतना बड़ा नहीं था कि मेहरा साहब उनकी वजह से यह रिस्क लेते।
वह कहते हैं, “हमारी किस्मत अच्छी थी कि कोई दूसरा अभिनेता ये रोल करने को तैयार नहीं हुआ। यह प्रकाश जी का दृढ़ विश्वास था, मैं इस पर सलाम करता हूँ।”
यह वो क्षण था जब विजय (जंजीर) और दीवार के किरदार को अमिताभ बच्चन ने अपनी आंखों की आग से अमर कर दिया। जावेद अख्तर कहते हैं, “मैंने जो देखा वह था अमिताभ की अभिनय क्षमता, जो यह साबित करती थी कि यही अभिनेता 'एंग्री यंग मैन' के नए अवतार को भारत के सामने पेश कर सकता है।”
अमिताभ बच्चन सिर्फ एक अभिनेता नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के मूल्यों — संयम, विनम्रता और परिश्रम — के प्रतीक हैं। सुपरस्टार बनने के बाद भी उनका सादा जीवन और दूसरों के प्रति सम्मान उन्हें असली महानायक बनाता है। उनकी यह सादगी आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी।


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