चिदंबरम का बयान—बिलों में हिंदी शब्दों का इस्तेमाल गैर-हिंदी भाषियों का अपमान, भाषा विवाद फिर गरमाया
नई दिल्ली, 16 दिसंबर 2025 । पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने संसद में पेश किए जा रहे विधेयकों में हिंदी शब्दों के बढ़ते प्रयोग को लेकर कड़ा ऐतराज जताया है। उन्होंने कहा कि आधिकारिक बिलों और कानूनी दस्तावेजों में ऐसे हिंदी शब्दों का उपयोग, जिन्हें गैर-हिंदी भाषी नागरिक समझ नहीं पाते, उनके सम्मान के खिलाफ है। चिदंबरम के इस बयान के बाद एक बार फिर देश में भाषा और भाषाई समानता को लेकर बहस तेज हो गई है।
कांग्रेस नेता पी चिदंबरम ने सरकार की तरफ से संसद में पेश होने वाले बिलों के टाइटल में हिंदी शब्दों के इस्तेमाल की बढ़ती प्रथा की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि यह बदलाव गैर-हिंदी भाषी लोगों का अपमान है।
चिदंबरम ने कहा कि गैर-हिंदी भाषी लोग ऐसे बिल/एक्ट को नहीं पहचान सकते जिनके टाइटल अंग्रेजी अक्षरों में लिखे हिंदी शब्दों में हों। वे उनका उच्चारण भी नहीं कर सकते।
पूर्व केंद्रीय मंत्री ने सोमवार को मनरेगा के नाम ‘विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) (VB-G RAM G) बिल, 2025’ पर अपनी राय रखी।
उन्होंने कहा- यह बदलाव गैर-हिंदी भाषी लोगों और उन राज्यों का अपमान है जिनकी आधिकारिक भाषा हिंदी के अलावा कोई और है।
चिदंबरम का कहना है कि भारत एक बहुभाषी देश है, जहां संविधान सभी भाषाओं को समान सम्मान देता है। ऐसे में विधायी प्रक्रिया में किसी एक भाषा को इस तरह प्राथमिकता देना, खासकर तब जब वह सभी नागरिकों के लिए सहज न हो, लोकतांत्रिक भावना के अनुरूप नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि संसद में पेश होने वाले बिल पूरे देश के लिए होते हैं, न कि किसी एक भाषाई वर्ग के लिए।
पूर्व केंद्रीय मंत्री ने पूछा- 75 साल की प्रथा में बदलाव जरूरी क्यों
राज्यसभा सांसद चिदंबरम ने सरकार से सवाल किया कि- अभी तक यह प्रथा थी कि बिल का टाइटल अंग्रेजी वर्जन में अंग्रेजी शब्दों में और हिंदी वर्जन में हिंदी शब्दों में लिखा जाता था। 75 साल की इस प्रथा में किसी को दिक्कत नहीं हुई, तो सरकार को बदलाव क्यों करना चाहिए? पिछली सरकारों ने इस वादे को दोहराया है कि अंग्रेजी एक सहयोगी आधिकारिक भाषा बनी रहेगी। मुझे डर है कि यह वादा टूट जाएगा।
उन्होंने तर्क दिया कि कानून और नीतियों की भाषा स्पष्ट, सरल और सभी के लिए समझने योग्य होनी चाहिए। यदि विधेयकों में ऐसे शब्द शामिल किए जाते हैं, जिनका अर्थ समझने के लिए अतिरिक्त प्रयास करना पड़े, तो इससे गैर-हिंदी भाषी सांसदों और नागरिकों को असहज स्थिति का सामना करना पड़ता है। चिदंबरम के अनुसार, यह केवल भाषा का सवाल नहीं, बल्कि समानता और समावेशन का मुद्दा है।
इस बयान पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आ रही हैं। कांग्रेस नेताओं ने इसे भाषाई विविधता की रक्षा से जोड़कर देखा है, जबकि कुछ अन्य दलों ने हिंदी को राजभाषा के रूप में बढ़ावा देने की बात कही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा आने वाले समय में संसद और सार्वजनिक विमर्श में और गहराई से उठ सकता है।
कुल मिलाकर, चिदंबरम का यह बयान देश में भाषा नीति, संसदीय प्रक्रिया और संघीय ढांचे से जुड़े संवेदनशील सवालों को फिर से सामने ले आया है। यह बहस इस बात पर केंद्रित होती दिख रही है कि राष्ट्रीय नीतियों और कानूनों में भाषाई संतुलन कैसे सुनिश्चित किया जाए।


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