दिल्ली फिर हुई पानी पानी
" आलोक गौड़ "
" कबीरा खड़ा बाजार में, मांगे सबकी खैर,
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर। "
नई दिल्ली। दिल्ली में 21 से 22 मिली मीटर हुई बारिश ने ही मानसून के दौरान होने वाली परेशानियों से निपटने के लिए की गई तैयारियों की पोल खोल कर रख दी है। इतनी सी बारिश ने जलभराव रोकने के लिए किए गए तमाम दावों को भी पूरी तरह से खोखला साबित कर दिया है।
विडंबना तो यह है कि दिल्ली को स्व .साहिब सिंह वर्मा और रेखा गुप्ता के रूप में दो दो मुख्यमंत्री देने वाले शालीमार बाग में भी पहली बार लोगों को जलभराव की समस्या से जूझना पड़ा है।
शालीमार बाग में ही मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता भी रहती हैं। इस वजह से वहां के नागरिक अपने को खुशनसीब मानने के साथ ही यह उम्मीद भी कर रहे थे कि शायद इस बार मानसून के दौरान उन्हें उन समस्याओं का सामना नहीं करना होगा, जिनसे पूरी दिल्ली के लोग जूझते हैं। लेकिन चंद मिली मीटर की बारिश ने ही उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया।
शालीमार बाग दिल्ली विकास प्राधिकरण की एक नियोजित आवासीय कालोनी है। जिसमें जल निकासी से लेकर हर तरह की व्यवस्था की गई है। यही वजह है कि यह क्षेत्र जलभराव की समस्या से अब तक अछूता था। लेकिन इस बार हल्की सी बारिश में इस इलाके को भी जलभराव का सामना करना पड़ा है।
दिल्ली में लगातार मूसलाधार बारिश होने की स्थिति में जलभराव से लेकर यातायात जाम व अन्य समस्याओं की किन परिस्थितियों से नागरिकों को दो चार होना पड़ेगा इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है। क्यूंकि चंद मिली मीटर की बारिश ने यह तो साबित कर ही दिया है कि सड़कों की आधी अधूरी मरम्मत (पैच लगा कर गड्ढे भर कर कीर्तिमान स्थापित करने के दिल्ली सरकार के दावों सहित), नालों की अधूरी सफाई, जलभराव की स्थिति में पंपों के जरिए पानी की निकासी की अस्थाई व्यवस्था से दिल्लीवासियों को मानसून के दौरान होने वाली परेशानियों से छुटकारा मिलने वाला नहीं है।
दिल्ली में छोटे बड़े कुल मिलाकर 2846 नाले हैं। इनके जरिए पानी तीन प्रमुख नालों नजफगढ़, बारापूला व शाहदरा से यमुना नदी तक पहुंचता है।
दिल्ली में मानसून आने से 2 से 3 महीने पहले ही 201 नालों की सफाई के लिए करोड़ों रुपए के टेंडर जारी किए जाते हैं। नालों की सफाई का काम 10 निकायों के अधीन आता है। मानसून से पहले दिल्ली सरकार से लेकर दिल्ली नगर निगम व अन्य निकायों की ओर से नालों की सफाई के दौरान हजारों टन गाद निकालने का दावा किया जाता है। हालांकि नालों से निकाली गई गाद और उसे ठिकाने लगाने पर हमेशा से ही सवालिया निशान लगते रहे हैं। इस काम में ठेकेदारों पर अधिकारियों की मदद से करोड़ों रुपए का घोटाला करने के भी आरोप लगते रहते हैं । मगर जैसे ही मानसून आता है उससे निपटने के लिए किए गए यह सारे दावे भी बह जाते हैं।
अगर दिल्ली सरकार लोगों का वास्तव में भला चाहती है तो उसे व्यर्थ की बयानबाजी छोड़ कर मानसून से निपटने की अधूरी योजनाओं को पूरा करने के लिए युद्धस्तर पर काम करना होगा। वरना लोग यूं ही परेशान होते रहेंगे।


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