आग लगने के बाद कुआं खोदने की आदत कब छूटेगी!

 " आलोक गौड़ "

कबीरा खड़ा बाजार में मांगे सबकी खैर,
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर।


नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली में अग्नि शमन विभाग की व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गईं है। दिल्ली अग्नि शमन सेवा के पास न पर्याप्त मात्रा में कर्मी हैं और न ही आवश्य उपकरण। रही सही कसर राजनेताओं व प्रशासनिक अधिकारियों के संरक्षण में हुए अवैध निर्माण पूरी कर देते हैं। जिनकी वजह से आग लगने व अन्य आपात स्थिति में समय पर अग्नि शमन सेवा की गाड़ियां पंहुच ही नहीं पाती हैं। जिससे जान माल का भारी नुकसान होता है।
दिल्ली की आबादी आज लगभग तीन करोड़ तक पंहुच गई है। इतनी बड़ी आबादी को देखते हुए कम से कम छह अग्नि शमन कर्मियों और 30 फायर स्टेशन की आवश्यकता है। जबकि हकीकत में इससे आधी संख्या में आग बुझाने वाले कर्मी व फायर स्टेशन हैं। पर्याप्त संख्या में फायर स्टेशन न बना पाने के लिए दिल्ली सरकार हमेशा ही जमीन न मिल पाने का रोना रोती रही है। दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी की ट्रिपल इंजन की सरकार बनने के बाद यह उम्मीद थी की दिल्ली की रेखा गुप्ता सरकार इस दिशा में ठोस कदम उठाएगी। लेकिन चार महीने बाद भी उसने इस दिशा में एक भी कदम नहीं उठाया है।
राजेन्द्र प्लेस के गोपाला टावर में हुए भीषण अग्निकांड के बाद सरकार ने प्रभावी अग्नि सुरक्षा नियम और भवन संबंधी नियम में संशोधन करने पर बल दिया था। उस समय सभी बहुमंजिला इमारतों में अग्नि शमन सुरक्षा के उपायों की जांच करने का अभियान चलाया गया। जिन इमारतों में अग्नि सुरक्षा के पर्याप्त उपाय नहीं किए गए थे। उनका कंप्लीशन प्रमाण पत्र रद्द करने की कार्रवाई भी की गई थी। बाद में गुजरते समय के साथ सब कुछ ठंडे बस्ते के हवाले कर दिया गया। यह ही वहज है कि आज अधिकांश वाणिज्यिक इलाकों में बनी बहुमंजिला इमारतों में बिल्डरों ने न केवल पार्किंग में अवैध निर्माण कर दुकानें बना कर बेच दीं हैं। बल्कि आपात स्थिति में इमारत से बाहर निकलने के मार्ग पर भी अनधिकृत अतिक्रमण करवा दिया है। जिसकी वजह से इन इमारतों में आग लगने पर जान माल का भारी नुकसान होता है। अग्नि शमन सेवा विभाग व अन्य सरकारी विभागों ने ऐसी इमारतों को सील करने और उनके बिल्डरों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई के बजाय सिर्फ यह नोटिस चिपका कर खानापूर्ति की है कि इस इमारत में अग्नि शमन के पर्याप्त प्रबंध नहीं किए गए हैं। इसलिए यह सुरक्षा की दृष्टि से खतरनाक है। 
दिल्ली में यकायक बढ़ते अग्निकांड ने एक बार फ़िर से इनसे निपटने के लिए सरकार की ओर से किए गए प्रबंध पर सोचने के लिए मजबूर कर दिया है।
दिल्ली सरकार की चूक की भारी कीमत नागरिकों को चुकानी पड़ रही है। हाल ही में रिठाला में प्रिंटिंग फैक्ट्री में हुए अग्निकांड में चार लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। उससे पहले मोतीनगर के गोल्डन बैंक्वेट हल में आग लग जाने से वहां काम करने वाले एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई थी। द्वारका के शब्द अपार्टमेंट में आग लगने की घटना में एक पिता और उसके दो बच्चों की दर्दनाक मौत हो गई थी। इन घटनाओं के अलावा आए दिन झुग्गियों में आगजनी होने की घटनाएं होती रहती हैं।
अगर दिल्ली सरकार यह चाहती है कि यहां रहने वाले नागरिक पूरी तरह से सुरक्षित रहें तो उसे न केवल वाणिज्यिक इमारतों और बहुमंजिला रिहायशी भवन के बारे में प्रभावी अग्नि सुरक्षा नियम बनाने के साथ ही भवन निर्माण संबंधी नियमों में संशोधन कर उनका पूरी कड़ाई के साथ पालन करना होगा। इसके साथ ही उसे दिल्ली अग्नि शमन सेवा में कर्मियों की भर्ती करने व नए फायर स्टेशन बनाने पर ध्यान देना होगा। नहीं तो लोग इसी प्रकार अग्निकांड का शिकार होकर असमय काल के मुंह में समाते रहेंगे