तमिलनाडु विधानसभा में अभूतपूर्व दृश्य—गवर्नर बिना अभिभाषण दिए सदन से वॉकआउट, सियासी टकराव तेज
चेन्नई, 20 जनवरी 2026 । तमिलनाडु की राजनीति में उस समय बड़ा घटनाक्रम देखने को मिला, जब राज्य के गवर्नर ने विधानसभा सत्र के दौरान बिना अभिभाषण दिए ही सदन से वॉकआउट कर दिया। आमतौर पर बजट सत्र या विशेष सत्र की शुरुआत गवर्नर के अभिभाषण से होती है, लेकिन इस बार परंपरा टूटने से राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली है। इस घटनाक्रम को राज्य सरकार और राजभवन के बीच चल रहे टकराव के एक नए अध्याय के रूप में देखा जा रहा है।
तमिलनाडु विधानसभा सत्र के दौरान मंगलवार को सदन में फिर हाईलेवल ड्रामा हुआ। राज्यपाल आरएन रवि एक बार फिर राष्ट्रगान के अपमान का आरोप लगाते हुए स्पीच दिए बिना ही असेंबली से बाहर चले गए।
पिछले सालों की तरह गवर्नर ने कहा कि तमिल गान के बाद राष्ट्रगान बजाया जाए। लेकिन स्पीकर अप्पावु ने इसके लिए मना कर दिया।
इसके बाद गवर्नर रवि शुरुआती भाषण पढ़े बिना ही विधानसभा से बाहर चले गए। इससे पहले 2024-25 में भी वे ऐसा कर चुके हैं।
राज्यपाल ने आरोप लगाया कि उनके भाषण में रुकावट डाली गई। उन्होंने कहा कि मैं निराश हूं। राष्ट्रगान को उचित सम्मान नहीं दिया गया।
गवर्नर के वॉकआउट के बाद विपक्षी AIADMK के नेता भी असेंबली से बाहर चले गए और राज्य सरकार के खिलाफ नारेबाजी की। वहीं तमिलनाडु CM ने इसे असेंबली का अपमान बताया है।
इस घटनाक्रम के बाद सत्तारूढ़ दल ने गवर्नर के कदम को लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ बताया। नेताओं का कहना है कि विधानसभा और चुनी हुई सरकार का सम्मान बनाए रखना संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की जिम्मेदारी होती है। वहीं विपक्ष ने इस मुद्दे पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दीं—कुछ ने इसे संवैधानिक संकट बताया तो कुछ ने इसे केंद्र–राज्य संबंधों में बढ़ते तनाव का संकेत करार दिया।
संवैधानिक विशेषज्ञों के मुताबिक, गवर्नर का अभिभाषण औपचारिक रूप से सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों को प्रस्तुत करता है, न कि व्यक्तिगत विचारों को। ऐसे में बिना स्पीच दिए वॉकआउट करना असामान्य माना जाता है और इसका राजनीतिक संदेश दूर तक जाता है। यह घटना एक बार फिर इस बहस को तेज कर रही है कि राज्यों में गवर्नर की भूमिका की सीमाएं क्या होनी चाहिए।
कुल मिलाकर, तमिलनाडु विधानसभा में हुआ यह वॉकआउट सिर्फ एक प्रोटोकॉल विवाद नहीं, बल्कि केंद्र और राज्य के रिश्तों, संवैधानिक मर्यादाओं और राजनीतिक शक्ति संतुलन से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन गया है। आने वाले दिनों में इस पर राजनीतिक बयानबाजी और संवैधानिक चर्चा और तेज होने की संभावना है।


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