नाटो को सख्त संदेश देने वाले ट्रम्प यूरोप के आगे क्यों नरम पड़े—रणनीति, दबाव और चुनावी गणित

नाटो को सख्त संदेश देने वाले ट्रम्प यूरोप के आगे क्यों नरम पड़े—रणनीति, दबाव और चुनावी गणित

वॉशिंगटन, 27 जनवरी 2026 । अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अक्सर नाटो (NATO) सहयोगियों पर रक्षा खर्च बढ़ाने का दबाव डालते रहे हैं। उनके बयानों से कई बार यह संदेश गया कि यदि यूरोपीय देश अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाते, तो अमेरिका समर्थन घटा सकता है। लेकिन हाल के घटनाक्रमों में यह देखा गया कि ट्रम्प का रुख कुछ मामलों में यूरोप के प्रति अपेक्षाकृत नरम दिखाई दिया। इसके पीछे कई रणनीतिक कारण माने जा रहे हैं।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने स्विट्जरलैंड के दावोस में हुए वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में जिस तरीके से यूरोपीय देशों की खिल्ली उड़ाई, उसी से साफ हो गया है कि वे इन्हें कितनी अहमियत देते हैं।

इसी बैठक से यूरोप को एक अहम सबक भी मिला। दावोस ने यूरोप को सिखाया कि जब सभी देश मिलकर सीमाओं और संप्रभुता की रक्षा करते हैं, तो बड़े देशों के दबाव का मुकाबला किया जा सकता है।

ट्रम्प ने जब इन देशों पर 1 फरवरी से 10% टैरिफ लगाने की धमकी दी तो, यूरोप ने अमेरिका पर 'ट्रेड बाजूका' लगाने की धमकी दी।

इसका मतलब साफ था कि यूरोप भी पूरी ताकत से जवाबी आर्थिक कदम उठाने के लिए तैयार है। आखिरकार दुनिया को टैरिफ से डराने वाले ट्रम्प को यूरोपीय यूनियन (EU) के 27 देशों के आगे झुकने पड़ा।

ट्रम्प ने ग्रीनलैंड पर भी नरमी बरती और कहा कि इस पर कब्जा करने के लिए ताकत का इस्तेमाल नहीं करेंगे। उन्होंने यूरोपीय देशों पर जो 10% टैरिफ लगाने का ऐलान किया था, उससे भी पीछे हट गए।

सबसे बड़ा कारण भूराजनीतिक संतुलन है। रूस-यूक्रेन संघर्ष और यूरोप की सुरक्षा स्थिति ने अमेरिका के लिए यूरोपीय साझेदारी को पूरी तरह कमजोर करना जोखिम भरा बना दिया। नाटो ढांचा अमेरिका को यूरोप में सैन्य, राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव बनाए रखने का मंच देता है। ऐसे में पूरी तरह टकराव की नीति अपनाना अमेरिकी रणनीतिक हितों के खिलाफ जा सकता है।

दूसरा पहलू आर्थिक परस्पर निर्भरता है। अमेरिका और यूरोपीय संघ के बीच भारी व्यापार, निवेश और तकनीकी साझेदारी है। रक्षा उद्योग, ऊर्जा आपूर्ति और टेक सेक्टर में सहयोग दोनों पक्षों के लिए लाभकारी है। कठोर रुख से बाजारों और निवेश माहौल पर नकारात्मक असर पड़ सकता था।

तीसरा कारण चुनावी और घरेलू राजनीति से जुड़ा माना जाता है। ट्रम्प की राजनीति “अमेरिका फर्स्ट” संदेश पर आधारित रही है, लेकिन वैश्विक नेतृत्व की छवि भी अमेरिकी मतदाताओं के एक हिस्से के लिए महत्वपूर्ण है। पूरी तरह अलगाववादी रुख अपनाने से अंतरराष्ट्रीय अस्थिरता का ठीकरा भी अमेरिका पर फूट सकता था, जो चुनावी रणनीति के लिहाज से जोखिम भरा है।

इसके अलावा, यूरोप ने भी हाल के वर्षों में रक्षा खर्च बढ़ाया है और नाटो प्रतिबद्धताओं पर ज्यादा सक्रियता दिखाई है। इससे अमेरिका के दबाव का कुछ असर दिखा और संवाद का रास्ता खुला। नतीजतन टकराव की बजाय दबाव + सहयोग वाला मिश्रित मॉडल सामने आया।

कुल मिलाकर, ट्रम्प का यूरोप के प्रति बदला हुआ स्वर झुकाव से ज्यादा रणनीतिक संतुलन माना जा रहा है—जहां बयानबाजी सख्त रहती है, लेकिन जमीनी स्तर पर गठबंधन बनाए रखने की मजबूरी भी उतनी ही मजबूत होती है।