गृह मंत्री जी की नींद कब टूटेगी!

" आलोक गौड़ "

" कबीरा खड़ा बाजार में मांगे सबकी खैर,
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर। "


नई दिल्ली। महाराष्ट्र में हिंदी बनाम मराठी के नाम पर शुरू हुआ विवाद कब राज्य में गृह युद्व जैसी स्थिति पैदा कर देगा, इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। लेकिन एक बात तो निश्चित है कि इसके दूरगामी परिणाम होंगे।
वैसे तो महाराष्ट्र में अपना अस्तित्व तलाश रही महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे ने भाषाई विवाद का मुद्दा उठाया था। जिसे अब महाराष्ट्र की भारतीय जनता पार्टी नीत सरकार ने भी लपक लिया है। वहां के मंत्री इस विषय पर एक दूसरे से बढ़ कर बयानबाजी कर रहे हैं। जिसकी वजह से हिन्दी बोलने वाले लोगों के साथ न केवल दुर्व्यवहार किया जा रहा है बल्कि उनके साथ मारपीट करने की घटनाएं भी प्रकाश में आ रहीं हैं।
वैसे तो भाषाई और क्षेत्रवाद की राजनीति का महाराष्ट्र के साथ चोली दामन का साथ रहा है।
राज्य की राजनीति में बेताज बादशाह रहे स्वर्गीय बाला साहब ठाकरे इसी के बल पर अपना जलवा कायम रखने और भारतीय जनता पार्टी को अपनी धुन पर नाचने के लिए मजबूर करने में सफल रहे थे। उनके निधन के बाद भतीजे राज ठाकरे को उम्मीद थी कि उन्हें ही शिव सेना के नायक की राजनीतिक विरासत संभालने का मौका मिलेगा। लेकिन बाला साहब ठाकरे के विश्वस्त शिव सैनिकों ने पार्टी की कमान उद्धव ठाकरे के हाथों में सौंप कर इन मंसूबों पर पानी फेर दिया।
इसके बाद से राज ठाकरे महाराष्ट्र की राजनीति में अपनी पैठ बनाने के लिए हाथ पैर मार रहे हैं। इसके लिए कभी वह पश्चिमी बंगाल की मुख्यमंत्री की तर्ज पर राज्य की अस्मिता की बात करते हैं तो कभी भाषाई विवाद को हवा दे रहे हैं।
राज ठाकरे की गतिविधियों को तो एक प्रकार से नजरअंदाज किया जा सकता है। लेकिन राज्य सरकार के मंत्रियों की ओर से हिंदी के विरोध में बयानबाजी करने से हालात काफी बिगड़ सकते हैं। क्योंकि उनके बयान की आड़ लेकर असामाजिक तत्व न केवल हिंदीभाषी लोगों को निशाना बना सकते हैं बल्कि हिंदी के विरोध के नाम पर अपनी दादागिरी दिखाने की कोशिश भी कर सकते हैं।
महाराष्ट्र में हिंदी के मुखर विरोध पर केंद्र सरकार और खासकर गृह मंत्रालय की चुप्पी सकते में डालने वाली है। गैर भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों में घटित होने वाली हर छोटी बड़ी घटना के बारे में अपनी तीखी प्रतिक्रिया देने वाले अमित शाह की खामोशी से तो ऐसा ही प्रतीत होता है कि महाराष्ट्र में हिन्दी का विरोध केंद्र सरकार की शह पर किया जा रहा है। अगर ऐसा नहीं होता तो सरकार पहले ही दिन इस बारे में सख्त चेतावनी जारी कर देती कि राष्ट्रभाषा हिंदी का अपमान करने और हिंदीभाषी के साथ दुर्व्यवहार करने की इजाजत किसी को भी नहीं दी जाएगी और ऐसा करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
महाराष्ट्र से शुरू हुई हिंदी के विरोध की आग की लपटें दूसरे राज्यों में भी फैलने की पूरी आशंका है। वैसे भी दक्षिण भारत के राज्यों खास कर तमिलनाडु में राजनीतिक धुरी का आधार ही हिंदी का विरोध रहा है। तमिलनाडु में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम पार्टी के नेता करुणानिधि ओर अन्ना द्रमुक पार्टी की जयललिता हिंदी के विरोध की राजनीति करके ही सालों तक राज्य की सत्ता पर काबिज रहीं थीं।
राष्ट्रभाषा होने के बावजूद आज तक हिंदी को वह सम्मान नहीं मिला है,  जिसकी वह हकदार है। इसके लिए अफसरशाही से लेकर राजनेताओं के साथ ही आम नागरिक भी समान रूप से जिम्मेदार हैं। क्योंकि जहां राजनेता हिंदी को उचित सम्मान दिलाने में विफल रहें हैं, तो वहीं अधिकारी अपने यहां हिंदी पखवाड़े का आयोजन कर संतुष्ट हो जाते हैं। आम लोग भी अपना ज्ञान बघारने के लिए हिंदी के बजाय अंग्रेजी भाषा का उपयोग करने लगते हैं।