शशि थरूर का बड़ा बयान, बोले– नेहरू की गलतियों को स्वीकार किए बिना इतिहास से नहीं सीख सकते
नई दिल्ली, 09 जनवरी 2026 । कांग्रेस नेता और सांसद शशि थरूर ने देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को लेकर एक अहम और संतुलित बयान दिया है। थरूर ने कहा है कि नेहरू के योगदान का सम्मान जरूरी है, लेकिन उनकी गलतियों को स्वीकार करना भी उतना ही आवश्यक है। इतिहास को केवल महिमामंडन के चश्मे से देखने के बजाय ईमानदारी से मूल्यांकन किया जाना चाहिए, ताकि देश उनसे सीख लेकर आगे बढ़ सके।
कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कहा कि नेहरू की गलतियों को स्वीकार करना जरूरी है, लेकिन देश की हर समस्या के लिए उन्हें अकेले दोषी ठहराना पूरी तरह गलत और अनुचित है।
थरूर ने कहा- मैं यह नहीं कहूंगा कि मोदी सरकार लोकतंत्र-विरोधी है, लेकिन वे निश्चित रूप से नेहरू-विरोधी हैं। नेहरू को एक सुविधाजनक बलि का बकरा बना दिया गया है।
उन्होंने कहा कि मैं भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के विचारों और दृष्टिकोण की गहरी प्रशंसा करता हूं, लेकिन नेहरू की हर मान्यता और नीति का बिना आलोचना समर्थन नहीं कर सकता।
थरूर गुरुवार को केरल विधानसभा अंतरराष्ट्रीय पुस्तक महोत्सव (KLIBF) के चौथे संस्करण में पहुंचे थे। उन्होंने कहा कि नेहरू भारतीय लोकतंत्र के संस्थापक थे। उन्होंने इसे मजबूती से स्थापित किया।
शशि थरूर ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि जवाहरलाल नेहरू आधुनिक भारत की नींव रखने वाले नेताओं में शामिल थे और उनके योगदान को नकारा नहीं जा सकता। लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि हर बड़े नेता की तरह नेहरू से भी कुछ नीतिगत और रणनीतिक चूक हुईं, जिन पर खुलकर चर्चा होनी चाहिए। थरूर के मुताबिक, किसी भी ऐतिहासिक व्यक्तित्व को आलोचना से परे रखना लोकतांत्रिक सोच के खिलाफ है।
थरूर का यह बयान ऐसे समय आया है जब देश में नेहरू की विरासत को लेकर राजनीतिक बहस तेज है। विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों ही अपने-अपने नजरिए से नेहरू की भूमिका को पेश कर रहे हैं। इस बीच थरूर ने बीच का रास्ता अपनाते हुए कहा कि न तो नेहरू को दोषों से परे देवता की तरह देखा जाना चाहिए और न ही सारी समस्याओं के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शशि थरूर का यह बयान कांग्रेस के भीतर भी एक आत्ममंथन की ओर इशारा करता है। लंबे समय से पार्टी पर यह आरोप लगता रहा है कि वह नेहरू-गांधी परिवार की आलोचना से बचती है। थरूर के बयान को इस सोच से हटकर एक परिपक्व और अकादमिक दृष्टिकोण के रूप में देखा जा रहा है।
थरूर ने यह भी कहा कि इतिहास से सीख लेने के लिए उसकी गलतियों को स्वीकार करना जरूरी होता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत को आगे बढ़ाने के लिए अतीत की उपलब्धियों के साथ-साथ कमियों पर भी ईमानदारी से चर्चा होनी चाहिए। ऐसा करने से न केवल लोकतांत्रिक संवाद मजबूत होगा, बल्कि नई पीढ़ी को भी इतिहास को समझने का संतुलित नजरिया मिलेगा।


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