सोनिया गांधी को दिल्ली कोर्ट ने जारी किया नोटिस — वोटर-लिस्ट विवाद में नया मोड़

सोनिया गांधी को दिल्ली कोर्ट ने जारी किया नोटिस — वोटर-लिस्ट विवाद में नया मोड़

नई दिल्ली, 09 दिसंबर 2025 । पिछले कुछ दिनों से मीडिया और राजनीतिक हलकों में छाए विवाद में एक नया मोड़ आ गया है — दिल्ली की Rouse Avenue Court (राऊज एवेन्यू कोर्ट) ने सोनिया गांधी को नोटिस जारी किया है। यह नोटिस उस याचिका (revision petition) के सिलसिले में आया है, जिसमें यह आरोप लगाया गया है कि 1980-81 की वोटर लिस्ट में उनका नाम शामिल किया गया था — जबकि तब तक वे भारतीय नागरिक नहीं बनी थीं।

दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने कांग्रेस सांसद सोनिया गांधी को नोटिस दिया है। यह नोटिस उस याचिका पर आया है, जिसमें दावा किया गया कि सोनिया गांधी का नाम 1980–81 की वोटर लिस्ट में गलत तरीके से जोड़ा गया था।

इसके अलावा याचिका में मजिस्ट्रेट के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें सोनिया गांधी के खिलाफ दायर शिकायत को खारिज कर दिया गया था। कोर्ट ने इस मामले में राज्य सरकार को भी नोटिस जारी किया है और पूरे केस का रिकॉर्ड (TCR) मंगाया है। अगली सुनवाई 6 जनवरी को होगी। इस दौरान सोनिया और राज्य सरकार को नोटिस का जवाब देना होगा। यह याचिका विकास त्रिपाठी ने दायर की है। मामले की सुनवाई विशेष न्यायाधीश (पीसी एक्ट) विशाल गोगने ने की। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि सोनिया गांधी का नाम नई दिल्ली विधानसभा क्षेत्र की 1980 की वोटर लिस्ट में था, जबकि वे भारत की नागरिक अप्रैल 1983 में बनीं।

13 अगस्त- भाजपा ने भी दो वोटर लिस्ट में नाम होने का दावा किया था

भाजपा की आईटी सेल के हेड अमित मालवीय ने भी 13 अगस्त को दावा किया था कि सोनिया गांधी का नाम भारत की वोटर लिस्ट में दो बार तब शामिल हुआ, जब वह भारतीय नागरिक भी नहीं थीं।

मालवीय ने X पर लिखा, 'यह पूरा मामला चुनावी कानून के स्पष्ट उल्लंघन का उदाहरण है। शायद यही कारण है कि राहुल गांधी भी ऐसे मतदाताओं को वैध करने के पक्ष में रहते हैं, जो अयोग्य या अवैध हैं और स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) का विरोध करते हैं।'

सोनिया गांधी को जारी नोटिस सिर्फ एक कानूनी औपचारिकता नहीं — यह उस लोकतान्त्रिक प्रक्रिया और मतदान प्रणाली की समीक्षा का संकेत है, जिस पर भारत का चुनावी तंत्र टिका है। चाहे यह मामला अदालत तक पहुंचे या कृत्रिम विवाद बने — दोनों ही स्थितियाँ यह दिखाती हैं कि भारत के लोकतंत्र में पुराने रिकॉर्ड, नागरिकता और मतदान अधिकार जैसे मुद्दे अभी भी संवेदनशील और विवादास्पद बने हुए हैं।