हरियाणा बना रेखा सरकार के लिए परेशानी का सबब 

" आलोक गौड़ "

" कबीरा खड़ा बाजार में मांगे सबकी खैर,
ना अपनी काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर। "


नई दिल्ली। ऐसा लगता है कि हरियाणा के मुख्यमंत्री नायाब सैनी शायद यह भूल गए हैं कि दिल्ली में अब आम आदमी पार्टी की नहीं बल्कि उन्हीं की भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। क्योंकि अगर ऐसा नहीं होता तो वह दिल्ली के हिस्से का पानी रोक कर दिल्ली की रेखा सरकार के लिए परेशानी का सबब न बनते। हरियाणा से यमुना नदी के जरिए दिल्ली आने वाला पानी रोक दिए जाने से पेयजल का संकट पैदा हो गया है। पेयजल की भारी किल्लत की वजह से लोगों में हाहाकार मच गया है।
दिल्ली जल बोर्ड के मुताबिक हरियाणा से यमुना नदी में तयशुदा मात्रा से कम पानी छोड़े जाने की वजह से वजीराबाद और चंद्रावल जल शोधन संयंत्र में पेयजल का उत्पादन घट गया है। जिसका असर पेयजल की आपूर्ति पर पड़ा है। उत्पादन कम होने से पेयजल की आपूर्ति में 25 से 30 फीसदी तक की कमी आई है। पेयजल संकट से 20 इलाके प्रभावित हुए हैं। इनमें नई दिल्ली नगर पालिका परिषद क्षेत्र  से लेकर दक्षिणी दिल्ली के पोश इलाके और उत्तरी दिल्ली तक के इलाके शामिल हैं।
दिल्ली जल बोर्ड ने हरियाणा से कम पानी मिलने के कारण पेयजल का उत्पादन कम होने के कारण जल संकट पैदा होने की बात तो मान ली। लेकिन उसने पेयजल संकट कब तक दूर होगा या दिल्ली सरकार इस दिशा में क्या कदम उठा रही है, इस बारे में कोई भी जानकारी नहीं दी है।
गौरतलब है कि जब जब दिल्ली की तत्कालीन आम आदमी पार्टी सरकार के मुखिया अरविंद केजरीवाल हरियाणा पर पानी रोक लेने या जानबूझ कर प्रदूषित पानी छोड़े जाने का आरोप लगाते थे। तब भारतीय जनता पार्टी के तमाम नेता उन्हें ,पानी पी पी कर कोसना शुरू कर देते थे। इतना ही तब केजरीवाल पर हमला बोलने वाले भारतीय जनता पार्टी के नेता यह तर्क भी देते थे कि कि हरियाणा में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। उसे बदनाम करने के लिए ही आम आदमी पार्टी के मुखिया इस तरह के आरोप लगा रहें हैं।
अब तो हरियाणा से लेकर दिल्ली तक और केंद्र में भी एक ही भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। फिर भला दिल्ली जल बोर्ड को पानी की किल्लत के लिए हरियाणा सरकार को कठघरे में खड़ा करने की जरूरत क्यों महसूस हुई।
अब जरा एक नज़र दिल्ली को मिलने वाले पानी की स्थिति और उसके दूसरे राज्यों पर निर्भर रहने की मजबूरी पर भी एक नज़र डाल लेते हैं। यह सच है कि दिल्ली के पास पानी के अपने कोई भी स्रोत नहीं हैं और उसे कच्चे पानी की उपलब्धता के लिए दूसरे राज्य खासकर हरियाणा पर निर्भर रहना पड़ता है। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि जो हरियाणा गर्मियों के मौसम में दिल्ली की प्यास बुझाने के अपने कर्तव्य से मुंह मोड़ लेता है। वही हरियाणा मानसून के दौरान अपने यहां बने सारे बैराज के द्वार खोल कर दिल्ली में बाढ़ जैसी स्थिति पैदा करने से भी बाज नहीं आता है।
यमुना नदी से मिलने वाले पानी में दिल्ली के साथ होने वाले अन्याय और यमुना जल बंटवारे के संबंध में दोनों राज्यों के मुख्य इंजीनियरिंग के बीच हुए समझौते के मुद्दे को लेकर दिल्ली के मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना ने  पांच राज्यों के बीच ऐतिहासिक समझौता कराया था।
उस वक्त इस समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले राज्यों में दिल्ली के अलावा हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश व राजस्थान शामिल थे। उस वक्त दिल्ली को छोड़ कर अन्य राज्यों में कांग्रेस की सरकारें थीं। समझौता हो जाने के बावजूद हरियाणा ने दिल्ली का पानी रोक लिया था।  उस वक्त दिल्ली के मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना ने अदालत का दरवाजा खटखटा और दिल्लीवासियों के हक़ में न केवल फैसला कराया बल्कि यह व्यवस्था भी दिलवाने में सफल रहे कि यदि हरियाणा ने दिल्ली के हिस्से का पानी रोका तो उसके खिलाफ अदालत की अवमानना करने के लिए कार्रवाई की जाएगी।
पिछले साल 14 जुलाई को दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी पानी के मुद्दे को लेकर अदालत का रुख किया था। अदालत ने दिल्ली सरकार की दलीलों को सही मानते हुए न केवल दिल्ली को यमुना जल समझौते के तहत प्रतिदिन 425 एमजीडी पानी देने के निर्देश दिए बल्कि मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए 150 एमजीडी अतिरिक्त पानी दिल्ली को देने के आदेश दिए थे।

अब देखना यह है कि हरियाणा सरकार की ओर से दिल्ली को दिए जाने वाले पानी में कटौती करने के मुद्दे को लेकर मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता भारतीय जनता पार्टी आलाकमान से गुहार लगाती हैं या अदालत का रुख करेंगी। अगर उन्होंने इनमें से एक भी कदम नहीं उठाया तो इससे यह समझा जाएगा कि दिल्लीवासियों के साथ पेयजल को लेकर होने वाले इस भेदभाव के पीछे उनकी भी मौन सहमति है।