सीएम रेखा गुप्ता की यह कैसी मजबूरी है!

आलोक गौड़    

" कबीरा खड़ा बाजार में, मांगे सबकी खैर 
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर l "


नई दिल्ली l दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने जिस प्रकार से अभिभावकों को सरकारी स्कूलों की दशा सुधार कर उनका स्तर निजी ( पब्लिक) स्कूल के बराबर करने का भरोसा दिलाने के बजाय अपने बच्चों का भविष्य उज्जवल बनाने के लिए निजी (पब्लिक) स्कूल में पढ़ाने का सुझाव दिया है l उसे लेकर कई तरह के सवाल पैदा हो गए हैं l
जंहा कुछ लोग इसे मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता की साफगोई व मजबूरी मान रहे हैं, तो दूसरी ओर उनके विरोधियों का कहना है कि इस तरह का बयान उन्होंने निजी (पब्लिक) स्कूल की लाबी और भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के दवाब में आकर दिया है l 
कहा तो यह भी जा रहा है कि जिस प्रकार से अपनी सरकार के प्रति अभिभावकों की बढ़ती नाराजगी को कम करने के लिए मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने दिल्ली स्कूल शिक्षा ( शुल्क निर्धारण एवं विनियमन पारदर्शिता) विधेयक हाल ही संपन्न हुए विधानसभा के मॉनसून सत्र में पारित कराया है l उसकी वजह से निजी (पब्लिक) स्कूल की लाबी और भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष नेतृत्व उनसे खफा हो गया है l
निजी (पब्लिक) स्कूल के संचालक न केवल भारतीय जनता पार्टी के समर्थक हैं, बल्कि भारी मात्रा में उसे चंदा भी देते हैं l इतना ही नहीं दिल्ली के अधिकांश निजी (पब्लिक) स्कूल पर भारतीय जनता पार्टी के नेताओं का ही वर्चस्व है l
हाल ही में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने अपने एक बयान में यह कहा था कि अब दिल्ली के बच्चे निजी (पब्लिक) स्कूलों में पढ़ कर अपना भविष्य उज्जवल बनाने के साथ ही इन में पढ़ कर ऊंचे पद हासिल कर देश की सेवा कर सकेंगे l इस तरह का बयान देकर मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने एक तरह से यह मान लिया कि निजी (पब्लिक) स्कूलों में शिक्षा का स्तर सरकारी स्कूलों की तुलना में काफी बेहतर है l अगर लोगों को अपने बच्चे का भविष्य संवारना है तो उन्हें अपने बच्चों को निजी (पब्लिक) स्कूल में पढ़ाना चाहिए l
शिक्षाविद व समाजशास्त्रियों ने मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के इस बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि इससे लोगों में सरकारी स्कूलों के प्रति उनकी विश्वसनीयता और भी कम होगी l वैसे भी शिक्षा के स्तर और अन्य सुविधाओं के मामले में निजी (पब्लिक ) स्कूलों के मुकाबले सरकारी स्कूल काफी पिछड़े हुए हैं l
वहीं दूसरी ओर अभिभावकों का कहना है कि मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को बच्चों को निजी (पब्लिक) स्कूलों में पढ़ाने की सलाह देने के बजाय उन्हें यह भरोसा दिलाना चाहिए था कि सरकारी स्कूल में शिक्षा का स्तर सुधारने, शिक्षकों की कमी दूर करने व बुनियादी सुविधाओं का ढांचा मजबूत करने की ओर ध्यान दिया जाएगा, ताकि लोग निजी (पब्लिक) स्कूलों के जाल में न फंसे l
ऐसा लगता है कि मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता इस तरह का बयान देकर दिल्लीवासियों को बेहतर स्कूली शिक्षा मुहैया कराने की अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रही हैं l जबकि यह किसी भी निर्वाचित सरकार का पहला कर्तव्य होता है l
शायद मुख्यमंत्री को यह नहीं पता कि निजी (पब्लिक) स्कूलों में दाखिला दिलवाने के लिए अभिभावकों को कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं और डोनेशन के नाम पर कितनी भारी रकम अदा करनी पड़ती है l
वैसे भी जिस शिक्षा विधेयक को पारित कराने को लेकर मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता अपनी पीठ खुद थपथपा रहीं हैं,  उसमें ऐसा कुछ भी नहीं जिससे अपने बच्चो को निजी (पब्लिक) स्कूलों में पढ़ाने वाले अभिभावकों को किसी प्रकार की राहत मिल सके l चलो यह मान भी लिया जाए कि अब निजी (पब्लिक) स्कूल मनमाने तरीके से फीस नहीं बढ़ा पाएँगे l हालांकि यह लगभग नामुमकिन ही है, क्योंकि स्कूल की समिति में शामिल अभिभावक अपने बच्चों का भविष्य देखते हुए स्कूल की प्रबंधन कमेटी की ओर से लाए गए किसी भी प्रस्ताव का विरोध करने की हिम्मत शायद ही जुटा पाएँगे l अभी भी निजी (पब्लिक) स्कूलों की जितनी फीस है उसे भरने में एक व्यक्ति के वेतन का अच्छा खासा हिस्सा फीस में चला जाता है l