दिल्ली में मेट्रो और इंटरनेट पर पाबंदी, 7 हजार लोगों की हिरासत का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा
नई दिल्ली, 15 अक्टूबर 2026 । दिल्ली में CJP के प्रदर्शन के दौरान मेट्रो स्टेशनों पर पाबंदियां लगाने, इंटरनेट सेवाओं में कथित बाधा और हजारों लोगों को हिरासत में लिए जाने का मामला एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया है। 15 अक्टूबर को शीर्ष अदालत इस पूरे घटनाक्रम से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। मामला 10 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रस्तावित प्रदर्शन के दौरान राजधानी में की गई सुरक्षा व्यवस्था और पुलिस कार्रवाई से जुड़ा है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, उस दिन करीब 7,000 लोगों को हिरासत में लिया गया था। अदालत पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को कानून की प्रक्रिया के बिना हिरासत में नहीं लिया जा सकता और मेट्रो, रेल तथा इंटरनेट सेवाओं को कानून के अनुरूप सामान्य बनाए रखना जरूरी है।
मेट्रो सेवा के मुद्दे पर DMRC ने कहा कि मेट्रो को पूरी तरह बंद नहीं किया गया था। सिर्फ 45 स्टेशनों पर ही आवाजाही रोकी गई थी।
दरअसल, 10 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी ने प्रदर्शन बुलाया था। पुलिस की अनुमति न होने के कारण दिल्ली में कड़ी बैरिकेडिंग की गई थी, मेट्रो स्टेशन बंद किए गए, इंटरनेट सेवाएं रोकी गई थीं और कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने 11 अक्टूबर को इन पाबंदियों पर नाराजगी जताते हुए सरकार और प्रशासन से जवाब तलब किया था। अब कोर्ट इस मामले से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है।
2 याचिकाएं दाखिल की गई थीं
याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि 9 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को निर्देश दिया था कि प्रदर्शन के कारण दिल्ली मेट्रो और यहां आने वाली ट्रेनों की आवाजाही पर पूरी तरह रोक न लगाई जाए। इसके बावजूद 10 अक्टूबर को प्रदर्शन के दौरान कोर्ट के आदेश का उल्लंघन हुआ।
इसके बाद कोर्ट ने रविवार को सुनवाई के दौरान दिल्ली के अधिकारियों को नोटिस जारी कर मंगलवार तक जवाब मांगा था। कोर्ट ने कहा था कि मेट्रो सेवाएं सामान्य रूप से चलनी चाहिए। इंटरनेट बाधित नहीं होना चाहिए और लोगों की आवाजाही नहीं रोकी जानी चाहिए।
CJP के प्रदर्शन को लेकर 2 याचिकाएं दाखिल की गई थीं। जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने इस पर सुनवाई की। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सरकार और दिल्ली पुलिस का पक्ष रखा।
वहीं, एडवोकेट कपिल सिब्बल, गोपाल शंकरनारायणन, मेनका गुरुस्वामी, संजय हेगड़े, शोएब आलम और शादान फरासत ने याचिकाकर्ताओं का पक्ष रखा।
आज सुप्रीम कोर्ट में किन मुद्दों पर होगी सुनवाई?
15 अक्टूबर की सुनवाई में दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान लगाई गई पाबंदियों, मेट्रो स्टेशनों पर प्रवेश और निकास सीमित करने, इंटरनेट सेवाओं में व्यवधान तथा लोगों को हिरासत में लेने से जुड़े मुद्दे उठेंगे। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि प्रदर्शन रोकने के लिए उठाए गए कदमों से आम नागरिकों की आवाजाही और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार पर असर पड़ा।
सुप्रीम कोर्ट यह भी देखेगा कि 9 अक्टूबर को मेट्रो और रेल सेवाओं को पूरी तरह बंद नहीं करने के संबंध में दिए गए निर्देशों का पालन हुआ या नहीं। अदालत ने पहले की सुनवाई में संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा था।
दिल्ली पुलिस ने हलफनामे में क्या दलील दी?
दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में सुरक्षा कारणों का हवाला दिया है। पुलिस के मुताबिक, 10 अक्टूबर के प्रदर्शन की अनुमति नहीं देने का फैसला पहले के प्रदर्शनों में हुई कथित हिंसा, सार्वजनिक व्यवस्था को लेकर चिंताओं और मध्य दिल्ली में हालिया प्रदर्शनों से हुई परेशानी को ध्यान में रखकर लिया गया था।
पुलिस ने यह भी कहा कि प्रतिबंधित क्षेत्र के बाहर किसी व्यक्ति के खिलाफ दिल्ली पुलिस अधिनियम की धारा 65 के तहत कार्रवाई नहीं की गई। पुलिस की दलील और प्रदर्शनकारियों की शिकायतों के बीच अब अदालत के सामने यह सवाल है कि सुरक्षा व्यवस्था लागू करते समय नागरिकों के अधिकारों और सामान्य जनजीवन को किस तरह सुरक्षित रखा जाए।
आज की सुनवाई में मेट्रो स्टेशनों पर पाबंदियों, हिरासत में लिए गए लोगों की कार्रवाई और इंटरनेट सेवाओं से जुड़े सवाल अहम रहेंगे। DMRC ने अपने हलफनामे में माफी मांगते हुए नेटवर्क पूरी तरह बंद न किए जाने की दलील दी है, जबकि दिल्ली पुलिस ने अपने कदमों को सुरक्षा संबंधी चिंताओं से जोड़कर उचित ठहराया है।
सुप्रीम कोर्ट का रुख इस बात के लिए महत्वपूर्ण होगा कि भविष्य में बड़े प्रदर्शनों के दौरान सार्वजनिक परिवहन, इंटरनेट सेवाओं और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। हालांकि, सुनवाई के अंतिम नतीजे और अदालत के नए निर्देशों की पुष्टि उसके आदेश के बाद ही होगी।


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