बिहार में अपराध को लेकर सियासी घमासान, सम्राट चौधरी सरकार की कानून-व्यवस्था पर उठ रहे सवाल

बिहार में अपराध को लेकर सियासी घमासान, सम्राट चौधरी सरकार की कानून-व्यवस्था पर उठ रहे सवाल

पटना, 16 अक्टूबर 2026 । बिहार में हाल के दिनों में सामने आई आपराधिक घटनाओं ने कानून-व्यवस्था को लेकर राजनीतिक बहस तेज कर दी है। विपक्ष सरकार पर अपराधियों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई नहीं करने का आरोप लगा रहा है, जबकि राज्य सरकार अपराध नियंत्रण के लिए सख्त कदम उठाने की बात कह रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर अपराधियों के बेखौफ होने की धारणा क्यों मजबूत हो रही है और इसके पीछे कौन-से प्रशासनिक, सामाजिक और न्यायिक कारण हो सकते हैं।

अक्टूबर 2026 में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने पुलिस अधिकारियों को अपराधियों की जिला और थानावार सूची तैयार करने, आदतन अपराधियों की निगरानी बढ़ाने और संवेदनशील सोशल मीडिया मामलों में त्वरित कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे। दूसरी ओर, विपक्ष राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति पर लगातार सवाल उठा रहा है।

अपराध की चर्चित घटना

हाल के ही घटना से इसे समझा जा सकता है। 15 अक्टूबर 2026 की सुबह भोजपुर जिले के आरा में नवादा थाना क्षेत्र के कनकपुरी मोहल्ले में बाइक सवार नकाबपोश बदमाशों ने 72 वर्षीय पूर्व कस्टम सुपरिंटेंडेंट रामकुमार सिंह (क्षत्रिय महासभा के बिहार अध्यक्ष) की गोली मारकर हत्या कर दी। वे घर के बाहर मॉर्निंग वॉक करने निकले थे। 16 अक्टूबर 2026 को समस्तीपुर जिले के दादपुर गांव में अपराधियों ने मिर्ची लेकर जा रहे एक पिकअप ड्राइवर सूरज कुमार को गोली मारकर हत्या कर दी।

1. पुलिस कार्रवाई और जवाबदेही पर सवाल

किसी भी राज्य में कानून का डर बनाए रखने के लिए पुलिस की त्वरित कार्रवाई, निष्पक्ष जांच और अपराधियों की लगातार निगरानी जरूरी होती है। यदि गंभीर मामलों में जांच धीमी हो, आरोपियों की गिरफ्तारी में देरी हो या पीड़ितों को समय पर न्याय न मिले, तो आम लोगों में असुरक्षा की भावना बढ़ सकती है।

बिहार में भी पुलिस की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर राजनीतिक बहस जारी है। हालांकि, किसी एक घटना के आधार पर पूरे राज्य की पुलिस व्यवस्था को विफल मानना उचित नहीं होगा। इसके लिए अपराध के आंकड़ों, जांच की स्थिति और अदालतों में मामलों के निपटारे का विश्लेषण जरूरी है।

2. न्याय मिलने में देरी से बढ़ती चिंता

अपराध नियंत्रण केवल गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है। मामलों की निष्पक्ष जांच, समय पर आरोपपत्र दाखिल होना, गवाहों की सुरक्षा और अदालत में प्रभावी सुनवाई भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

यदि गंभीर अपराधों में दोषसिद्धि होने में लंबा समय लगता है, तो न्याय व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठ सकते हैं। इसलिए पुलिस, अभियोजन पक्ष और न्यायालयों के बीच बेहतर समन्वय अपराध नियंत्रण की अहम जरूरत है।

3. राजनीतिक संरक्षण के आरोप और अपराध का मुद्दा

बिहार में कानून-व्यवस्था को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप भी जारी हैं। विपक्षी नेता सरकार पर अपराधियों के हौसले बढ़ने का आरोप लगाते हैं, जबकि सत्तारूढ़ दल सख्त पुलिस कार्रवाई और सुशासन का हवाला देता है।

इन आरोपों की वास्तविकता समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि क्या किसी मामले में आरोपी को राजनीतिक संरक्षण मिला, जांच प्रभावित हुई या कार्रवाई में जानबूझकर देरी की गई। ठोस सबूतों के बिना किसी राजनीतिक दल या सरकार को अपराधियों को संरक्षण देने का दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।

4. शराबबंदी और अवैध कारोबार की चुनौती

बिहार में शराबबंदी लागू है, लेकिन अवैध शराब की तस्करी और उससे जुड़े गैरकानूनी कारोबार को रोकना प्रशासन के लिए चुनौती बना हुआ है। ऐसे कारोबारों से जुड़े नेटवर्क पर कार्रवाई के लिए पुलिस को खुफिया जानकारी, सीमावर्ती क्षेत्रों में निगरानी और दूसरे राज्यों की एजेंसियों के साथ समन्वय की जरूरत होती है।

हालांकि, शराबबंदी को राज्य में अपराध बढ़ने का एकमात्र कारण मानने के लिए पर्याप्त प्रमाण आवश्यक हैं। अपराध के अलग-अलग प्रकारों और उनके कारणों का स्वतंत्र रूप से विश्लेषण करना जरूरी है।

5. क्या बिहार में वास्तव में अपराध बढ़ा है?

इस सवाल का जवाब देने के लिए अपराध के आंकड़ों को देखना जरूरी है। इंडियन एक्सप्रेस की जनवरी 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, बिहार पुलिस द्वारा साझा किए गए 2025 के आंकड़ों में हत्या, डकैती और दंगों जैसे कई गंभीर अपराधों में पिछले वर्षों की तुलना में गिरावट दर्ज की गई थी। वहीं, चोरी, सेंधमारी और साइबर अपराध जैसे कुछ अन्य अपराधों में बढ़ोतरी की बात सामने आई थी।

इससे स्पष्ट होता है कि बिहार में अपराध की स्थिति को केवल एक सामान्य दावे से नहीं समझा जा सकता। अलग-अलग अपराध श्रेणियों, दर्ज मामलों, पुलिस की कार्रवाई और न्यायिक परिणामों को अलग-अलग देखना होगा। गंभीर घटनाओं की खबरें चिंता पैदा कर सकती हैं, लेकिन पूरे राज्य में अपराध बढ़ने या घटने का निष्कर्ष व्यापक और तुलनीय आंकड़ों के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए।

6. सरकार ने अपराध नियंत्रण के लिए क्या कदम उठाए?

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने 9 अक्टूबर 2026 को कानून-व्यवस्था की समीक्षा बैठक में पुलिस को आदतन अपराधियों पर निगरानी बढ़ाने, अपराधियों की थानावार सूची तैयार करने और जरूरत के मुताबिक अपराध नियंत्रण कानून के तहत कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे। उन्होंने पुलिस प्रशासन को अधिक सक्रिय, जवाबदेह और तकनीक आधारित बनाने पर भी जोर दिया।

इन निर्देशों का वास्तविक असर जानने के लिए यह देखना होगा कि कितने मामलों में कार्रवाई हुई, कितने वांछित आरोपी गिरफ्तार किए गए और गंभीर अपराधों की जांच कितनी तेजी से पूरी हुई।

बिहार में कानून-व्यवस्था को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब केवल राजनीतिक बयानबाजी से नहीं मिलेगा। इसके लिए निष्पक्ष पुलिसिंग, पारदर्शी जांच, समय पर न्याय और अपराधियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई जरूरी है।

सरकार की जिम्मेदारी है कि वह नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे और अपराध नियंत्रण से जुड़े आंकड़े सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराए। वहीं, विपक्ष की भूमिका समस्याओं को तथ्यों के साथ सामने लाने और प्रशासन से जवाबदेही मांगने की है। आखिरकार, कानून-व्यवस्था का मूल्यांकन राजनीतिक दावों के बजाय विश्वसनीय आंकड़ों और जमीन पर दिखने वाले परिणामों से होना चाहिए।