बिहार के दो निर्दलीय MLC की सदस्यता पर संकट, बंशीधर ब्रजवासी और राहुल राज के मामले में कोर्ट जा सकता है विपक्ष
पटना, 5 नवंबर 2026 | बिहार की राजनीति में दो निर्दलीय विधान पार्षदों बंशीधर ब्रजवासी और डॉ. राहुल राज की सदस्यता को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। दोनों पर विधान परिषद चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीत हासिल करने के बाद भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सदस्यता लेने का आरोप है। इस मामले में राष्ट्रीय जनता दल (RJD), जन सुराज और INDIA गठबंधन के नेताओं ने कार्रवाई की मांग उठाई है।
विपक्ष का कहना है कि अगर दोनों नेताओं ने चुनाव जीतने के बाद किसी राजनीतिक दल की औपचारिक सदस्यता ली है, तो संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत उनकी सदस्यता समाप्त हो सकती है। दूसरी ओर, दोनों नेताओं ने सफाई दी है कि उन्होंने भाजपा की सदस्यता नहीं ली, बल्कि पार्टी को समर्थन देने का फैसला किया है। ऐसे में अब पूरा मामला बिहार विधान परिषद के कार्यकारी सभापति रामवचन राय के फैसले पर निर्भर करता है।
संविधान की दुश्मन भाजपा: तेजस्वी
नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने भी निर्दलीय एमएलसी को बीजेपी में शामिल कराने का मुद्दा उठाया था। उन्होंने कहा कि 'निर्दलीय विधानपार्षदों को भाजपा अपनी पार्टी में शामिल कर मनमर्जी का कानून चला रही है। भाजपा संविधान और लोकतंत्र की सबसे बड़ा दुश्मन है। भाजपा दोहरा रवैया अपनाती है। भाजपा के विधायक को कोर्ट से सजा होने के बावजूद स्पीकर उसकी सदस्यता रद्द नहीं करते। साहेबगंज के विधायक राजू सिंह का उदाहरण देते हुए कहा कि विपक्षी दलों के विधायकों को अपने पाले में करने के लिए कई बार बोली लगाई जाती है, लेकिन लिखित शिकायत देने के बावजूद उनकी सदस्यता रद्द नहीं की जाती।
कैसे शुरू हुआ पूरा विवाद?
बिहार विधान परिषद की आठ सीटों के लिए हुए चुनाव में बंशीधर ब्रजवासी और डॉ. राहुल राज निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में विजयी हुए थे। बंशीधर ब्रजवासी ने तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से और राहुल राज ने सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से जीत हासिल की थी। दोनों ने जेडीयू के उम्मीदवारों को हराया था।
चुनाव परिणाम आने के कुछ दिनों बाद दोनों नेता पटना स्थित भाजपा प्रदेश कार्यालय पहुंचे। वहां मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी की मौजूदगी में पार्टी के कार्यक्रम में शामिल हुए। इस दौरान दोनों की भाजपा का गमछा पहने और सदस्यता पर्ची लिए तस्वीरें सामने आईं।
भाजपा की ओर से भी शुरुआत में दोनों के पार्टी में शामिल होने की जानकारी दी गई थी। हालांकि, दल-बदल कानून के तहत सदस्यता जाने का सवाल उठने के बाद भाजपा ने अपनी पोस्ट वापस ले ली और कहा कि दोनों ने पार्टी को समर्थन दिया है।
जन सुराज और RJD ने सभापति को सौंपा ज्ञापन
इस मामले में सबसे पहले जन सुराज पार्टी ने मोर्चा खोला। पार्टी के प्रतिनिधिमंडल ने बिहार विधान परिषद के कार्यकारी सभापति रामवचन राय से मुलाकात कर दोनों नेताओं की सदस्यता समाप्त करने की मांग की। जन सुराज ने अपनी शिकायत के समर्थन में पेन ड्राइव और अन्य साक्ष्य भी सौंपे।
इसके बाद 4 नवंबर को राष्ट्रीय जनता दल के नेतृत्व में INDIA गठबंधन के प्रतिनिधिमंडल ने भी सभापति से मुलाकात की। प्रतिनिधिमंडल ने आरोप लगाया कि दोनों निर्दलीय MLC ने भाजपा की प्राथमिक सदस्यता ग्रहण की है। इसलिए उनके खिलाफ संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत कार्रवाई होनी चाहिए।
RJD नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी ने भी इस मामले में दोनों नेताओं की सदस्यता समाप्त करने की मांग उठाई। विपक्ष का कहना है कि चुनाव जीतने के बाद किसी निर्दलीय सदस्य का राजनीतिक दल में शामिल होना संवैधानिक प्रावधानों के खिलाफ है।
क्या कहता है संविधान का दल-बदल कानून?
भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची में दल-बदल के आधार पर संसद और विधानमंडलों के सदस्यों की अयोग्यता से जुड़े प्रावधान हैं। इसके पैराग्राफ 2(2) के मुताबिक, यदि कोई निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव जीतने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है, तो उसे सदन की सदस्यता के लिए अयोग्य ठहराया जा सकता है।
इस मामले में सबसे अहम सवाल यह है कि बंशीधर ब्रजवासी और राहुल राज ने भाजपा की औपचारिक सदस्यता ली थी या केवल पार्टी को समर्थन देने की घोषणा की थी। दोनों स्थितियों के कानूनी परिणाम अलग हो सकते हैं।
यदि यह साबित होता है कि उन्होंने चुनाव जीतने के बाद भाजपा की सदस्यता ग्रहण की, तो उनके खिलाफ अयोग्यता की कार्रवाई हो सकती है। हालांकि, इस पर अंतिम फैसला संबंधित सदन के सभापति को करना होगा।
भाजपा और दोनों MLC ने बदला अपना रुख
विवाद बढ़ने के बाद भाजपा ने कहा कि दोनों नेता पार्टी में शामिल नहीं हुए हैं, बल्कि उन्होंने भाजपा को समर्थन देने का फैसला किया है। बंशीधर ब्रजवासी और राहुल राज ने भी इसी तरह की सफाई दी।
उनका तर्क है कि किसी राजनीतिक दल को समर्थन देना और उसकी औपचारिक सदस्यता लेना अलग-अलग बातें हैं। वहीं, विपक्ष का दावा है कि शुरुआती बयान, सदस्यता पर्चियां और कार्यक्रम की तस्वीरें उनके पार्टी में शामिल होने के संकेत देते हैं।
यही विरोधाभास अब इस विवाद का मुख्य कानूनी आधार बन गया है। सभापति के सामने यह तय करने की चुनौती होगी कि उपलब्ध दस्तावेज और बयान औपचारिक सदस्यता साबित करने के लिए पर्याप्त हैं या नहीं।
कोर्ट जाने की तैयारी में विपक्ष
जन सुराज और RJD ने संकेत दिए हैं कि यदि सभापति के स्तर पर उचित कार्रवाई नहीं होती, तो वे न्यायालय का रुख कर सकते हैं। जन सुराज पहले ही इस मामले को अदालत में चुनौती देने की बात कह चुकी है। RJD नेताओं ने भी जरूरत पड़ने पर हाईकोर्ट जाने के संकेत दिए हैं।
हालांकि, फिलहाल दोनों MLC के खिलाफ सदस्यता समाप्त करने का कोई अंतिम आदेश जारी नहीं हुआ है और न ही उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार अदालत का अंतिम फैसला आया है। पहले सभापति कानूनी विशेषज्ञों से सलाह लेकर शिकायत पर निर्णय करेंगे।
जेडीयू की नाराजगी ने बढ़ाई राजनीतिक हलचल
इस विवाद का एक राजनीतिक पहलू भी है। दोनों निर्दलीय MLC ने चुनाव में जेडीयू के उम्मीदवारों को हराया था। इसके बाद उनका भाजपा के साथ जाना NDA के भीतर भी चर्चा का विषय बना।
रिपोर्टों के मुताबिक, जेडीयू के कुछ नेताओं ने इस घटनाक्रम पर नाराजगी जताई है। ऐसे में मामला केवल दो विधान पार्षदों की सदस्यता तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बिहार के सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर राजनीतिक समीकरणों से भी जुड़ गया है।
फिलहाल बंशीधर ब्रजवासी और राहुल राज की सदस्यता पर फैसला होना बाकी है। सभापति की कानूनी राय, शिकायतों पर उनका निर्णय और जरूरत पड़ने पर अदालत की सुनवाई ही तय करेगी कि दोनों नेताओं की विधान परिषद सदस्यता बनी रहेगी या नहीं।


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