यूपी चुनाव में 1% वोट भी मिले तो निशांत कुमार के लिए बड़ी कामयाबी

यूपी चुनाव में 1% वोट भी मिले तो निशांत कुमार के लिए बड़ी कामयाबी

पटना,04 नवंबर 2026 | उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर बिहार की सत्तारूढ़ जनता दल यूनाइटेड (JDU) ने अपनी राजनीतिक सक्रियता बढ़ा दी है। पार्टी ने उत्तर प्रदेश में संगठन मजबूत करने की जिम्मेदारी बिहार के स्वास्थ्य मंत्री और नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार को दी है। निशांत ने भी साफ संकेत दिया है कि JDU आगामी विधानसभा चुनाव में उतरने की तैयारी कर रही है और उसकी कोशिश NDA के घटक दल के रूप में चुनाव लड़ने की होगी।

उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में JDU के लिए चुनावी सफलता का आकलन केवल सीटों की संख्या से नहीं होगा। पार्टी अगर अपना वोट प्रतिशत बढ़ाकर एक प्रतिशत के आसपास भी पहुंचाती है, तो इसे संगठन के विस्तार और राजनीतिक पहचान बनाने की शुरुआती उपलब्धि के तौर पर देखा जा सकता है। हालांकि, यह एक राजनीतिक आकलन है, चुनावी सफलता का कोई आधिकारिक पैमाना नहीं।

नीतीश कुमार के बाद निशांत कुमार

जनता दल यू का मिशन उत्तर प्रदेश कोई नया अभियान नहीं है। इसके पहले जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे आरसीपी सिंह ने कमान संभाली तो इसके बाद वर्तमान मंत्री श्रवण कुमार ने भी बीड़ा उठाया था। लेकिन इनके अभियान का फलाफल नहीं मिला। जीत तो दूर प्रत्याशियों की जमानत तक नहीं बची। हाल के दिनों में यूपी चुनाव में जदयू उतरी और चुनाव भी दमखम के साथ लड़ी। जेडीयू ने साल 2012 और 2022 में अकेले दम पर यूपी में भाग्य आजमाया था।

निशांत कुमार ने क्या कहा?

निशांत कुमार ने उत्तर प्रदेश में JDU का संगठन मजबूत करने की बात कही है। उन्होंने कहा कि पार्टी 2027 का विधानसभा चुनाव NDA के घटक दल के रूप में लड़ने का प्रयास करेगी। उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में चल रहे विकास कार्यों का समर्थन करते हुए कहा कि JDU उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ सकती है।

निशांत का कहना है कि पार्टी का उद्देश्य अपने संगठन का विस्तार करना और नीतीश कुमार की विचारधारा को उत्तर प्रदेश के लोगों तक पहुंचाना है। फिलहाल बीजेपी और JDU के बीच उत्तर प्रदेश में सीटों के बंटवारे को लेकर कोई औपचारिक समझौता घोषित नहीं हुआ है। 

यूपी में JDU का पुराना चुनावी रिकॉर्ड कैसा रहा?

उत्तर प्रदेश में JDU का चुनावी इतिहास बहुत मजबूत नहीं रहा है। पार्टी ने अलग-अलग चुनावों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश की, लेकिन उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली।

  • 2002 विधानसभा चुनाव: JDU ने 16 सीटों पर चुनाव लड़ा और 2 सीटें जीतीं।

  • 2007 विधानसभा चुनाव: पार्टी ने 16 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और 1 सीट पर जीत हासिल की।

  • 2012 विधानसभा चुनाव: JDU ने 219 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन एक भी सीट नहीं जीत सकी।

  • 2017 विधानसभा चुनाव: पार्टी ने चुनाव नहीं लड़ा।

  • 2022 विधानसभा चुनाव: JDU ने 27 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन कोई सीट नहीं जीत सकी। उसका वोट शेयर करीब 0.11 प्रतिशत रहा।

इन आंकड़ों से साफ है कि उत्तर प्रदेश में पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपना स्थायी वोट बैंक और मजबूत संगठन तैयार करना है। 

एक प्रतिशत वोट का क्या होगा मतलब?

JDU के लिए उत्तर प्रदेश में एक प्रतिशत वोट हासिल करना भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है। इसकी वजह यह है कि पार्टी का पिछला वोट शेयर काफी कम रहा है। अगर 2027 में पार्टी अपने प्रदर्शन में सुधार करती है, तो उसे राज्य में संगठन विस्तार, कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने और भविष्य की राजनीति के लिए आधार तैयार करने में मदद मिल सकती है।

हालांकि, केवल वोट प्रतिशत बढ़ने से विधानसभा में सीटें जीतने की गारंटी नहीं मिलती। चुनाव में उम्मीदवारों की स्थिति, स्थानीय संगठन, गठबंधन, जातीय समीकरण और क्षेत्रवार वोटों का वितरण भी अहम भूमिका निभाएगा।

कुर्मी वोट बैंक पर JDU की नजर

उत्तर प्रदेश में JDU की रणनीति के केंद्र में कुर्मी और अति पिछड़ा वर्ग के मतदाता भी हो सकते हैं। पूर्वांचल और मध्य उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में कुर्मी समुदाय का राजनीतिक प्रभाव है। बीजेपी की सहयोगी अपना दल (सोनेलाल) भी इस सामाजिक आधार में मजबूत मौजूदगी रखती है।

ऐसे में JDU के सामने दोहरी चुनौती होगी। उसे एक ओर अपना अलग जनाधार तैयार करना होगा, वहीं दूसरी ओर NDA के भीतर सहयोगी दलों के साथ सीटों और सामाजिक समीकरणों का तालमेल भी बैठाना होगा। अगर पार्टी गठबंधन में चुनाव लड़ती है, तो सीटों का बंटवारा उसकी रणनीति का अहम हिस्सा होगा। 

योगी सरकार के दौर में JDU का नंबर गेम

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में बीजेपी उत्तर प्रदेश में NDA का प्रमुख चेहरा है। राज्य में अपना दल (एस), निषाद पार्टी और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी जैसे सहयोगी दल भी गठबंधन की राजनीति का हिस्सा रहे हैं। ऐसे में JDU की एंट्री सीटों के बंटवारे और सहयोगी दलों के बीच राजनीतिक संतुलन को प्रभावित कर सकती है।

JDU के लिए NDA के साथ चुनाव लड़ना ज्यादा व्यावहारिक रास्ता हो सकता है, क्योंकि इससे उसे गठबंधन के समर्थन और संगठनात्मक नेटवर्क का लाभ मिल सकता है। दूसरी तरफ, अगर सीटों पर सहमति नहीं बनती और पार्टी अकेले चुनाव लड़ती है, तो उसे सीमित संसाधनों और कमजोर स्थानीय संगठन के साथ मुकाबला करना होगा।

निशांत कुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती

निशांत कुमार के लिए उत्तर प्रदेश का चुनाव संगठनात्मक क्षमता दिखाने का एक बड़ा अवसर होगा। उन्हें पार्टी के पुराने चुनावी प्रदर्शन से आगे निकलने के लिए बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना होगा। वाराणसी में आयोजित कार्यकर्ता सम्मेलन के दौरान भी उन्होंने गांव, पंचायत और बूथ स्तर पर संगठन मजबूत करने पर जोर दिया था।

अब सबकी नजर इस बात पर है कि JDU बीजेपी के साथ कितनी सीटों पर समझौता कर पाती है और निशांत कुमार पार्टी के वोट प्रतिशत को कितना बढ़ा पाते हैं। उत्तर प्रदेश में एक प्रतिशत वोट का लक्ष्य भी पार्टी के लिए शुरुआती राजनीतिक परीक्षा बन सकता है।