करोड़ों रुपए पानी में बहाने के बाद भी गंगा मैली की मैली ही है

" आलोक गौड़ "

" कबीरा खड़ा बाजार में मांगे सबकी खैर, ना काहू से दोस्ती अपनी, ना काहू से बैर।"


नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर मोदी जी ने मैली गंगा को निर्मल करने के लिए पिछले 11साल से न केवल एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं। इतना ही नहीं उन्होंने गंगा की हालत सुधारने के लिए जनता के खून पसीने की कमाई के साथ ही विदेश से मिले करोड़ों रुपए भी इसके पानी में बहा दिए। बावजूद इसके गंगा न केवल मैली की मैली है बल्कि वह आज पहले से भी कहीं ज़्यादा प्रदूषित हो गई। जाहिर सी बात है कि मैली गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाने की योजना भी अन्य सरकारी योजनाओं की तरह ही भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई है। गंगा भले ही साफ न हुई हो। मगर उसने उसकी दशा सुधारने का काम करने वाले ठेकेदार व सरकारी अधिकारियों की सात पुश्तों का उद्धार जरूर कर दिया है।
प्रधानमंत्री मोदी ने पहली बार अपने पद की शपथ लेते समय गंगा की स्थिति सुधारने के लिए नमामि गंगे परियोजना की घोषणा की थी। जून 2014 में गंगा की स्वच्छता व प्रदूषण उन्मूलन के लिए 20 हजार करोड़ रुपए की राशि का प्रावधान किया गया। 29 मई 2015 को स्वच्छ गंगा कोष की पहली बैठक आयोजित की गई। जबकि दूसरी बैठक इसके तीन साल बाद हुई। क्योंकि वित्त मंत्री के पास इस तरह की बैठक के लिए समय ही नहीं था। इन तीन साल के दौरान स्वच्छ गंगा कोष को केवल 29.99 लाख रुपए दिए गए। इनमें से अधिकांश राशि विज्ञापनबाजी पर खर्च की गई। 
गंगा सफाई के कार्य में मदद देने के लिए जर्मन सरकार भी आगे आई थी। क्योंकि उसके पास राइना ,एल्बे और अन्य नदियों को साफ करने का अनुभव था।
विदेशी मदद व कर्ज के कारण नमामि गंगे परियोजना का बजट 30 हजार करोड़ रुपए तक पहुंच गया। मगर मर्ज बढ़ता गया, ज्यों ज्यों की तर्ज पर गंगा पहले से भी ज्यादा मैली व प्रदूषित होती चली गई।
गंगा को साफ व स्वच्छ बनाने के लिए समाजसेवी एन गोविंदाचार्य के साथ अभियान में भाग लेने वाले जगदीश ममगाई के मुताबिक सरकार ने इस परियोजना के लिए करोड़ों रुपए की राशि का प्रावधान तो कर दिया। मगर इस संबंध में नीति बनाने व निगरानी करने की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। यही कारण है कि पूरी परियोजना ही बेअसर साबित हुई है।
हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन योजना को जनता की आंख में धूल झोंकने का प्रयास बताया है। अदालत ने नमामि गंगा परियोजना के तहत खर्च धनराशि का हिसाब किताब न दिए जाने पर अपनी नाराजगी जताई है।
हाल ही में एक दैनिक अखबार ने 1450 किलोमीटर क्षेत्र में गंगा का दौरा कर उसकी दुर्दशा का विवरण दिया है। उसके मुताबिक जगह जगह बालू के अवैध खनन के कारण गंगा के प्रवाह में बाधा आई है। इसके अलावा गंगा नदी में गिरने वाले अवशिष्ट के पुनर्चक्रण और उसके उपयोग की योजना बनाने में विफल रही है।