हरियाणा में लैंड पूलिंग पॉलिसी-2026 को मंजूरी

हरियाणा में लैंड पूलिंग पॉलिसी-2026 को मंजूरी

चंडीगढ़,04 नवंबर 2026 | हरियाणा सरकार ने शहरी और औद्योगिक विकास परियोजनाओं में जमीन मालिकों की भागीदारी बढ़ाने के लिए नई लैंड पूलिंग पॉलिसी-2026 को मंजूरी दे दी है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में इस प्रस्ताव को मंजूरी मिली। नई नीति वर्ष 2022 की पुरानी लैंड पूलिंग पॉलिसी की जगह लेगी।

नई व्यवस्था के तहत परियोजना के कुल बिक्री योग्य विकसित क्षेत्र का 50 प्रतिशत हिस्सा जमीन मालिकों को मिलेगा, जबकि बाकी 50 प्रतिशत हिस्सा विकास एजेंसी के पास रहेगा। इसके अलावा जमीन देने वाले मालिकों को चार साल तक हर साल प्रति एकड़ एक लाख रुपये की अंतरिम वित्तीय सहायता भी दी जाएगी।

नई नीति मौजूदा लैंड पूलिंग पॉलिसी-2022 का स्थान लेगी। इसके तहत भू-मालिकों को उनकी ओर से दी गई जमीन के बदले विकसित क्षेत्र का 50 प्रतिशत हिस्सा मिलेगा। साथ ही, उन्हें चार वर्षों तक प्रतिवर्ष प्रति एकड़ एक लाख रुपये की अंतरिम वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी।

नई नीति में भू-मालिकों के हितों को प्राथमिकता देते हुए विकास परियोजनाओं को पूरा करने की समय-सीमा पांच वर्ष से घटाकर चार वर्ष कर दी गई है। विकास एजेंसी को परियोजना की अंतिम स्वीकृति मिलने की तारीख से चार वर्ष के भीतर सभी आवश्यक बुनियादी सुविधाओं का विकास करना होगा। निर्धारित अवधि में काम पूरा नहीं होने पर संबंधित भू-मालिकों को उनकी भूमि वापस लौटाने का प्रविधान किया गया है।

हरियाणा सरकार का मानना है कि नई लैंड पूलिंग पॉलिसी से विकास परियोजनाओं में भू-मालिकों की सक्रिय भागीदारी बढ़ेगी। साथ ही, उन्हें विकसित भूमि में उचित हिस्सेदारी, नियमित अंतरिम आर्थिक सहायता और परियोजनाओं के समयबद्ध क्रियान्वयन की गारंटी मिलने से भूमि मालिकों का भरोसा मजबूत होगा।

भुगतान में देरी पर भूमालिकों को मिलेगा नौ प्रतिशत ब्याज
नई नीति के तहत स्वीकृत लेआउट प्लान के अनुसार परियोजना के कुल बिक्री योग्य क्षेत्र का 50 प्रतिशत हिस्सा भू-मालिकों को और शेष 50 प्रतिशत विकास एजेंसी को मिलेगा। भू-मालिकों के हिस्से का निर्धारण बाजार मूल्य से जोड़ने संबंधी पहले के प्रविधान को हटा दिया गया है।

जमीन मालिकों को मिलेगा 50 प्रतिशत विकसित क्षेत्र

नई नीति में जमीन मालिकों के हिस्से को बाजार मूल्य से जोड़ने वाली पुरानी व्यवस्था हटा दी गई है। अब स्वीकृत लेआउट प्लान के अनुसार परियोजना के कुल बिक्री योग्य क्षेत्र का आधा हिस्सा जमीन मालिकों को आवंटित किया जाएगा।

इस हिस्से में पात्रता के अनुसार व्यावसायिक स्थल भी शामिल होंगे। बाकी भूखंड परियोजना की प्रकृति के आधार पर आवासीय, औद्योगिक या संस्थागत श्रेणी में दिए जाएंगे। इससे जमीन मालिकों को विकसित परियोजना में सीधे हिस्सेदारी मिलेगी। 

चार साल तक हर एकड़ पर मिलेंगे ₹1 लाख

सरकार ने जमीन मालिकों को आर्थिक सहायता देने का भी प्रावधान किया है। इसके तहत जमीन के योगदान के अनुपात में प्रति एकड़ सालाना एक लाख रुपये की अंतरिम वित्तीय सहायता मिलेगी। यह सहायता सेल डीड यानी विक्रय विलेख के पंजीकरण की तारीख से चार साल तक दी जाएगी।

यदि सेल डीड पंजीकृत होने के 15 दिनों के भीतर सहायता राशि हस्तांतरित नहीं होती है, तो देरी की अवधि के लिए जमीन मालिक को 9 प्रतिशत सालाना साधारण ब्याज देने का प्रावधान है। 

आवासीय, औद्योगिक और संस्थागत प्लॉट का न्यूनतम आकार तय

नई नीति में विकसित भूखंडों का न्यूनतम आकार भी निर्धारित किया गया है।

  • आवासीय प्लॉट: कम से कम 100 वर्ग मीटर।

  • औद्योगिक प्लॉट: कम से कम 250 वर्ग मीटर।

  • संस्थागत प्लॉट: कम से कम 500 वर्ग मीटर।

वास्तविक आवंटन जमीन मालिक के योगदान के अनुपात में होगा। पात्रता के अनुसार 2,000 वर्ग मीटर से अधिक जमीन देने वाले मालिकों को कियोस्क या बूथ के रूप में व्यावसायिक स्थल भी मिल सकेंगे। 

999 वर्ग मीटर से कम जमीन देने वालों को नकद मुआवजा

सरकार ने छोटे जमीन मालिकों के हितों को ध्यान में रखते हुए अलग व्यवस्था की है। जिनका भूमि योगदान 999 वर्ग मीटर से कम होगा, उन्हें विकसित प्लॉट के बजाय नकद मुआवजा दिया जाएगा।

यह राशि भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 के प्रावधानों के अनुसार या संबंधित प्लॉट के आरक्षित मूल्य के आधार पर तय होगी। दोनों में से जो राशि अधिक होगी, उसका भुगतान किया जाएगा। 

चार साल में पूरा करना होगा विकास कार्य

नई नीति में विकास परियोजनाओं को पूरा करने की समय-सीमा पांच साल से घटाकर चार साल कर दी गई है। विकास एजेंसी को परियोजना की अंतिम मंजूरी मिलने के चार साल के भीतर सड़क, बिजली, पानी और अन्य जरूरी बुनियादी सुविधाओं का विकास करना होगा।

यदि निर्धारित समय में बुनियादी ढांचा तैयार नहीं होता है, तो संबंधित जमीन मालिकों को उनकी जमीन वापस लौटाने का प्रावधान है। कुछ परिस्थितियों में 75 प्रतिशत जमीन मालिकों की सहमति से एक साल का अतिरिक्त समय दिए जाने की व्यवस्था भी बताई गई है। 

जमीन मालिक प्रमाणपत्र जोड़कर बड़े प्लॉट के लिए कर सकेंगे आवेदन

नीति के तहत लैंड एंटाइटलमेंट सर्टिफिकेट रखने वाले जमीन मालिक अपने प्रमाणपत्रों को आपस में जोड़कर बड़े विकसित भूखंड के लिए संयुक्त आवेदन कर सकेंगे। इससे कम जमीन देने वाले मालिक भी मिलकर बड़े प्लॉट लेने का विकल्प चुन सकेंगे।

इसके अलावा विकास एजेंसी को आवंटित प्लॉट वापस खरीदने की अवधि एक साल से बढ़ाकर तीन साल कर दी गई है। लैंड एग्रीगेटर को संबंधित क्षेत्र की कृषि भूमि के कलेक्टर रेट का 0.5 प्रतिशत पारिश्रमिक मिलेगा। इसका भुगतान विकास एजेंसी करेगी। नई नीति में ई-भूमि के माध्यम से होने वाली लैंड पूलिंग को शामिल नहीं किया गया है। 

नई नीति का उद्देश्य जमीन मालिकों को विकास प्रक्रिया में भागीदार बनाना और अनियोजित कॉलोनियों तथा अवैध प्लॉटिंग पर अंकुश लगाने में मदद करना है। गुरुग्राम, फरीदाबाद और पंचकूला जैसे तेजी से विकसित हो रहे शहरी क्षेत्रों में नियोजित आवासीय और औद्योगिक परियोजनाओं के लिए यह व्यवस्था महत्वपूर्ण हो सकती है।